लखनऊ । गर्भावस्था के दौरान किसी भी तरह का वायरल इंफेक्शन होतो है, तब भी आगे जाकर शिशु को स्किजोफ्रेनिया (पागलपन) होने की अधिक आशंका होती है। इसके अलावा प्रसव के समय शिशु को चोट लगना से भी उसमें आगे जाकर स्किजोफ्रेनिया होने की संभावना बढ़ जाती है। फि लहाल यह बीमारी किशोरावस्था में ज्यादा पायी जाती है। अगर देखा जाए तो इस बीमारी के मरीज ज्यादा मिलते है। यह बात बुधवार को स्टेट मेंटल हेल्थ अथॉरिटी के सचिव तथा किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के जिरियाट्रिक मेंटल हेल्थ के विभागाध्यक्ष प्रो. एससी तिवारी ने बुधवार को विश्व स्किजोफ्रेनिया-डे पर पत्रकार वार्ता को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने बताया कि शिशु को इस मानसिक बीमारी से बचाने के लिए गर्भवती महिला को सभी प्रकार के संक्रमण से बचाव बेहद जरूरी है। विश्व स्वास्थ संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक कुल आबादी के लगभग एक प्रतिशत लोग इस बीमारी से चपेट में हैं।
डा. तिवारी ने बताया कि स्किजोफ्रेनिया एक तरह की मानसिक बीमारी है। इसे उन्माद भी कहा जा सकता है। इस बीमारी में व्यक्ति के दिमाग की सोचने समझने की यह क्षमता प्रभावित हो जाती है। उन्होंने बताया कि स्किजोफ्रेनिया बीमारी 13 से 14 साल की उम्र ही किसी को भी हो सकती है। अगर किशोरावस्था में अचानक व्यवहार में परिवर्तन होने लगता हैतो विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए। डॉ. तिवारी का कहना है कि यह बीमारी किसी भी तरह से अनुवांशिक (हेरिडिट्री) नहीं है। इसके अलावा जेनेटिक कारण भी इसके लिए अधिक जिम्मेदार नहीं हैं।
उनका कहना है कि आज भी अधिकतर लोग इस बीमारी को दैवीय प्रकोप समझ कर फूंक-झाड़ में लग जाते हैं। और इलाज का कीमती समय खत्म कर देते हैं। अगर इस बीमारी की सही समय से पहचान व इलाज हो जाए तो 90 फीसदी से भी अधिक मरीज पूरी तरह ठीक हो जाते हैं। इन्हें जीवन भर दवा खाने की भी जरूरत नहीं पड़ती। डा. तिवारी ने बताया कि देखा गया है कि मौसम के साथ इस बीमारी में समस्या भी बढ़ जाती हैं। उन्हांने बताया कि बारिश का मौसम खत्म होने व सर्दी शुरू होने के बीच के मौसम व सर्दी खत्म होने व बसंत का मौसम शुरू होने के बीच के समय इन मरीजों की समस्या बढ़ जाती है।
यह हैं लक्षण –
- अचानक व्यवहार में परिवर्तन आना
- रात मेंलगातार अनिद्रा की चपेट में
- उल्टी सीधी हरकते लगातार करना
- सोचने-समझने की कार्य क्षमता खो देना
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