संगठनों की चुप्पी पर भारी पड़ा एक पत्रकार, पेंशन की लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर

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अजीत कुमार सिंह का एलान,अब लड़ाई संगठन नहीं, संकल्प से जीती जाएगी

साढ़े तीन साल से फाइलों में दबी योजना, अब उठी आवाज़ से हिलने लगा सिस्टम

त्रिनाथ कुमार शर्मा

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में जहां एक ओर कई राज्यों में पत्रकार पेंशन योजना लागू होकर जमीन पर उतर चुकी है, वहीं प्रदेश के पत्रकार आज भी अपने अधिकार के लिए इंतजार की लंबी कतार में खड़े हैं। विडंबना यह है कि दर्जनों बड़े-बड़े संगठन होने के बावजूद पत्रकारों की पेंशन और चिकित्सा सुविधाओं जैसे मूल मुद्दों पर कोई ठोस पहल नहीं दिखी। मंच सजते रहे, बयान गूंजते रहे, लेकिन हकीकत फाइलों में ही कैद रही।
इसी खामोशी के बीच वरिष्ठ पत्रकार अजीत कुमार सिंह ने गत वर्ष से अकेले मोर्चा संभालते हुए सरकार के सामने एक बार फिर मजबूत दस्तक दी है। 27 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री को भेजे गए अपने प्रथम अनुस्मारक पत्र में उन्होंने साफ तौर पर उन शासनादेशों का हवाला दिया है, जो 2021 और 2022 में जारी हुए थे। इन आदेशों के तहत पत्रकारों को मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत चिकित्सा सुविधा और 60 वर्ष से अधिक आयु के पत्रकारों को पेंशन देने की व्यवस्था की गई थी।

हैरानी की बात यह है कि इन जनकल्याणकारी योजनाओं को लागू हुए साढ़े तीन साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन सूचना विभाग द्वारा आवश्यक डेटा उपलब्ध न कराए जाने के कारण योजनाएं आज तक धरातल पर नहीं उतर सकीं। सरकार की ओर से 2023, 2024 और 2025 में कई बार अनुस्मारक भेजे गए, लेकिन जिम्मेदार विभागों की उदासीनता ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अजीत कुमार सिंह ने अपने पत्र में मुख्यमंत्री से इस पूरे प्रकरण की जांच कराने और संबंधित अधिकारियों को तत्काल डेटा प्रस्तुत करने के निर्देश देने की मांग की है। उनका कहना है कि यह सिर्फ सुविधा का मामला नहीं, बल्कि पत्रकारों के सम्मान और अधिकार का प्रश्न है।

श्री सिंह ने दो टूक कहा कि जब सभी संगठन किनारे हो गए, तब उन्होंने इसे व्यक्तिगत संकल्प बनाकर लड़ाई जारी रखी। अब यह लड़ाई भीड़ की नहीं, हौसले की है। अगर जज़्बा जिंदा हो तो अकेला इंसान भी सिस्टम को झुकाने का माद्दा रखता है,यह संदेश उन्होंने साफ तौर पर दिया है।
आज हालात ऐसे हैं कि अजीत कुमार सिंह सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि संघर्ष की पहचान बन चुके है।

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