श्रीकृष्ण जन्मोत्सव: 4 सितंबर को मनाया जाएगा कान्हा का 5253वां जन्मदिन, जानिए शुभ मुहूर्त

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​लखनऊ। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को देशभर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व पूर्ण आस्था और धूमधाम से मनाया जाता है। द्वापर युग में इसी तिथि को भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ था। स्वास्तिक ज्योतिष केन्द्र (अलीगंज, लखनऊ) के ज्योतिषाचार्य एस.एस. नागपाल के अनुसार, इस वर्ष भगवान श्रीकृष्ण का 5253वां जन्मोत्सव 4 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा।

​दुर्लभ योग और नक्षत्रों का संयोग
​द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र, हर्षण योग और वृषभ राशि के चंद्रमा में हुआ था। इस वर्ष 4 सितंबर को जन्मोत्सव के दिन सुबह से रात 11:04 बजे तक रोहिणी नक्षत्र रहेगा, जिसके बाद मृगशिरा नक्षत्र प्रारंभ होगा।

​हर्षण योग: प्रातःकाल से दोपहर 3:44 बजे तक।
​वज्र योग: दोपहर 3:44 बजे से शुरू होकर 5 सितंबर को दोपहर 12:47 बजे तक।
​विशेष संयोग: मध्यरात्रि पूजा के समय मृगशिरा नक्षत्र और वज्र योग का अद्भुत संयोग रहेगा।
​जन्माष्टमी मध्यरात्रि पूजा का शुभ मुहूर्त
​कान्हा के जन्मोत्सव के लिए मध्यरात्रि का समय सबसे महत्वपूर्ण माना गया है:
​पूजा का श्रेष्ठ समय: रात 11:57 बजे से मध्यरात्रि 12:43 बजे तक।
​अवधि: 46 मिनट।
​इसी शुभ अवधि में बाल गोपाल का जन्मोत्सव मनाकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाएगी।

​व्रत का महत्व और धार्मिक मान्यताएं
​धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, जन्माष्टमी का व्रत करने से साधक को ऐश्वर्य, यश, आयु, लाभ और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन व्रत रखने और लड्डू गोपाल की निस्वार्थ सेवा करने से निसंतान दंपत्तियों को योग्य संतान की प्राप्ति का वरदान मिलता है। श्रद्धालु इस लोक के समस्त सुख भोगकर अंत में परम पद को प्राप्त होते हैं।
​पूजा विधि और पारण का नियम
​झांकी व सजावट: भक्त घर के मंदिर या पवित्र स्थान पर बाल गोपाल की मूर्ति या चित्र स्थापित कर आकर्षक झांकी सजाते हैं। कान्हा को झूला, पालना, बांसुरी, मोर पंख और ताजे फूलों से सजाया जाता है।

​अभिषेक व श्रृंगार: मध्यरात्रि 12 बजे जन्म के पश्चात बाल गोपाल को पंचामृत से स्नान कराया जाता है और नए वस्त्र धारण कराए जाते हैं।
​भोग व आरती: कान्हा को माखन-मिश्री, धनिये की पंजीरी और मखाने की खीर का प्रिय भोग लगाकर आरती उतारी जाती है।
​व्रत पारण: कई श्रद्धालु मध्यरात्रि आरती और भोग के बाद व्रत का पारण करते हैं, जबकि कुछ परंपरा अनुसार अगले दिन प्रातःकाल पारण करते हैं।

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