SGPGI: लैब में विकसित किया मानव हार्ट वाल्व मॉडल, भविष्य में बनेंगे ‘जीवित कृत्रिम वाल्व’

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SGPGI के वैज्ञानिकों की बड़ी कामयाबी

​लखनऊ । संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGI), लखनऊ के वैज्ञानिकों ने कार्डियोवैस्कुलर मेडिसिन के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। शोधकर्ताओं ने मानव हृदय वाल्व की ‘वाल्व इंटरस्टिशियल कोशिकाओं’ (Valve Interstitial Cells) को सफलतापूर्वक अलग कर लैब में उनका कल्चर मॉडल तैयार कर लिया है।
​यह खोज भविष्य में टिश्यू-इंजीनियर्ड (जीवित) मानव हृदय वाल्व बनाने का रास्ता साफ करेगी, जिससे वाल्व रिप्लेसमेंट (प्रत्यारोपण) की जरूरत वाले गंभीर मरीजों को नया जीवन मिल सकेगा।

​क्यों खास है यह खोज?
​हृदय वाल्व की मजबूती, संरचना और क्षतिग्रस्त ऊतकों (tissues) की मरम्मत में इंटरस्टिशियल कोशिकाएँ सबसे अहम भूमिका निभाती हैं।
​लैब में अध्ययन: शोधकर्ताओं ने इन कोशिकाओं को न केवल लैब में सक्रिय रखा, बल्कि उनके मेटाबॉलिज्म में बदलाव कर उनके व्यवहार को भी समझा।

​रूमैटिक हार्ट डिजीज की समझ: वाल्व सर्जरी से गुजर रहे मरीजों के ऊतकों से ‘प्राइमरी ह्यूमन रूमैटिक वाल्व इंटरस्टिशियल सेल कल्चर’ बनाया गया। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि बीमारी वाल्व को धीरे-धीरे कैसे नुकसान पहुँचाती है।
​बीमारी के पीछे के 2 मुख्य ‘विलेन’ सिग्नलिंग पाथवे की पहचान
​शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि रूमैटिक हार्ट डिजीज केवल वाल्व की संरचनात्मक खराबी नहीं है, बल्कि यह एक लगातार चलने वाली जैविक प्रक्रिया है।

अध्ययन में दो प्रमुख सिग्नलिंग पाथवे की पहचान की गई:
​TGF-β/SMAD3
​ERK1/2
​ये दोनों सिग्नलिंग मार्ग हृदय वाल्व में सूजन (inflammation) और फाइब्रोसिस (ऊतकों में स्थायी दाग बनने की प्रक्रिया) को बढ़ावा देते हैं।

मरीजों को क्या होगा सीधा फायदा?
​सर्जरी में देरी या बचाव: ऐसी लक्षित दवाइयाँ (targeted therapies) विकसित की जा सकेंगी जो फाइब्रोसिस को रोकें या धीमा कर दें, जिससे कई मरीजों में वाल्व प्रत्यारोपण सर्जरी की जरूरत को टाला जा सकेगा।
​दवाओं का परीक्षण: यह लैब मॉडल नई दवाओं के असर को परखने और नए बायोमार्कर खोजने के लिए एक मजबूत रिसर्च प्लेटफॉर्म बनेगा।

​🏛️ अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में मिली जगह
​भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT), नई दिल्ली द्वारा पोषित इस अध्ययन को ‘स्प्रिंगर नेचर’ की प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘जर्नल ऑफ फिजियोलॉजी एंड बायोकेमिस्ट्री’ में प्रकाशन के लिए स्वीकार कर लिया गया है। इसे “इंटरस्टिशियल डिज़ीज़” श्रेणी के प्रभावशाली अनुसंधानों में स्थान मिला है।

👨‍🔬 शोध टीम और प्रमुख योगदानकर्ता
​यह सफलता एसजीपीजीआई के तीन प्रमुख विभागों के संयुक्त प्रयास का परिणाम है:
​नेतृत्व: डॉ. शांतनु पांडे (CVTS विभाग) एवं डॉ. आलोक कुमार (मॉलिक्यूलर मेडिसिन एवं बायोटेक्नोलॉजी विभाग)।
​प्रमुख शोधकर्ता: चरण साई रामिरेड्डी, अंजलि सिंह, मोहित के. राय, प्रो. विकास अग्रवाल और प्रो. सुरेन्द्र के. अग्रवाल।

​आगे का चरण: पैथोलॉजी विभाग की डॉ. विनीता अग्रवाल भी हिस्टोपैथोलॉजी (ऊतक-रोग विज्ञान) विश्लेषण के लिए टीम में शामिल हुई हैं।
एसजीपीजीआई के निदेशक प्रो. आर. के. धीमन ने शोध टीम को बधाई देते हुए कहा:
“यह उपलब्धि बायोमेडिकल रिसर्च, इनोवेशन और ट्रांसलेशनल मेडिसिन के प्रति एसजीपीजीआई की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। पूरी रिसर्च टीम बधाई की पात्र है।

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