लखनऊ। सनातन परंपरा और संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोपरि माना गया है। हर वर्ष आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि को गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व बड़े ही श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व न केवल अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है, बल्कि जीवन में ज्ञान और प्रकाश के महत्व को समझने का भी एक अनूठा अवसर है।
📜 वेदव्यास जी का जन्म और बुद्ध का प्रथम उपदेश
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि पर चारों वेदों के रचयिता और महाभारत ग्रंथ के लेखक महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास (वेदव्यास जी) का जन्म हुआ था। उन्हें आदिगुरु माना जाता है, इसलिए इस दिन को ‘व्यास पूर्णिमा’ के नाम से भी जाना जाता है।
इसके अतिरिक्त, बौद्ध धर्म में भी इस दिन का विशेष महत्व है, क्योंकि इसी तिथि पर भगवान बुद्ध ने सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया था।

⏰ तिथि और उदयातिथि का गणित
स्वास्तिक ज्योतिष केन्द्र (अलीगंज) के ज्योतिषाचार्य एस.एस. नागपाल के अनुसार:
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 28 जुलाई, शाम 06:18 बजे
पूर्णिमा तिथि समापन: 29 जुलाई, रात 08:05 बजे
उदयातिथि मान्यता: शास्त्रानुसार उदयातिथि का महत्व होने के कारण 29 जुलाई को ही स्नान, दान, व्रत और गुरु पूजन की पूर्णिमा मनाई जाएगी।
🌟 पूजा के लिए श्रेष्ठ मुहूर्त और विशेष योग
पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त: 29 जुलाई को सुबह 05:41 बजे से सुबह 09:47 बजे तक।
ग्रह-नक्षत्रों की शुभ स्थिति:
29 जुलाई को चंद्रमा उत्तराषाढ़ा नक्षत्र और मकर राशि में संचार करेंगे। सबसे खास बात यह है कि इस दिन गुरु (बृहस्पति) ग्रह अपनी उच्च राशि कर्क में विराजमान रहेंगे। इस दुर्लभ और शुभ योग में गुरु की पूजा करने से जीवन में सुख, समृद्धि, ज्ञान और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।
🛕 गुरु पूर्णिमा पूजन विधि (स्टेप-बाय-स्टेप)
स्नान व वस्त्र: सुबह शीघ्र उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र (विशेषकर पीले या सफेद रंग के) धारण करें।
चौकी स्थापना: घर के उत्तर-पूर्व कोने (ईशान कोण) में एक चौकी रखें और उस पर पीला या सफेद कपड़ा बिछाएं।
प्रतिमा स्थापना: चौकी पर महर्षि वेदव्यास, अपने गुरुदेव, या भगवान विष्णु/शिव की तस्वीर स्थापित करें।
पूजन सामग्री: प्रतिमा पर रोली, चंदन, अक्षत, पीले फूल, फल और मिठाई अर्पित करें।
मंत्र जाप: गुरु के चरणों का ध्यान करते हुए ‘ॐ गुरुभ्यो नमः’ या ‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु…’ मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें।
आरती व आशीर्वाद: अंत में कपूर से आरती करें और घर के बड़े-बुजुर्गों व गुरुजनों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें।












