एनेस्थीसिया की इस तकनीक से नहीं टलेगीं हाई रिस्क वाले मरीजों की सर्जरी

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लखनऊ। अब हाई रिस्क वाले ऐसे मरीज, जिनमें पहले से हृदय, फेफड़े की परेशानी है, उनमें भी सुरक्षित सर्जरी संभव हो सकेगी। इनमें एनेस्थीसिया के कारण होने वाले कुप्रभाव के कारण सर्जरी नहीं टलेगी। Cl मरीजों को एनेस्थीसिया के सामान्य होने तक के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। ऐसे गंभीर मरीजों के लिए संजय गांधी पीजीआई ने सेगमेंटल स्पाइनल एनेस्थेसिया तकनीक स्थापित कर ली है। विभाग के एनेस्थीसिया विशेषज्ञ प्रो. संदीप खूबा, प्रो. चेतना शमशेरी, विभाग के प्रमुख प्रो. संजय धीराज, ने इस तकनीक के बारे में बताया कि पहले भी पूर्ण बेहोशी न देकर स्पाइनल एनेस्थीसिया दिया जाता था, जिसमें कमर के नीचे का पूरा हिस्सा सुन्न हो जाता था।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

इसके कारण चलने में परेशानी के साथ ही ब्लड प्रेशर और हार्ट रेट पर कुप्रभाव की आशंका रहती थी।विशेषज्ञों ने बताया कि स्पाइन हड्डी, पेट, चेस्ट, किडनी ट्रांसप्लांट सहित बड़ी सर्जरी में पूर्ण बेहोशी दी जाती है, जिसमें दवा अधिक लगती है और रिकवरी में समय लगता है। कई बार सर्जरी के बाद वेंटिलेटर पर रखना होता है। अब नई तकनीक से इनमें भी सर्जरी हो रही है। किडनी ट्रांसप्लांट में नई तकनीक से हाल में ही ट्रांसप्लांट किया गया है। जिसमें कोई जटिलता (कंप्लीकेशन) नहीं हुई।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

महाराष्ट्र के डा नरेश पाॅलीवाल ने बताया कि नयी तकनीक से सेगमेंटल स्पाइनल एनेस्थेसिया में जिस अंग में सर्जरी करनी होती है, उस बीमारी का अल्ट्रासाउंड से देखकर स्टीक उसी पर फोकस करके एनिसिथिसिया का डोज दे दिया जाता हैं लेकिन कितनी मात्रा का को देना है उस पर निगरानी जरूरी है।केवल उसी अंग को सुन्न किया जाये । सर्जरी के दौरान मरीज बात करता रहता है, जिससे सर्जरी और सुरक्षित हो जाती है। इस तकनीक से मरीज को बहुत सी बीमारियां होने पर मरीज के शरीर में जहां की सर्जरी की जरूरत होती है ।उसी पार्ट को शून्य करके शल्य क्रिया कर मरीज जल्दी स्वस्थ हो जाता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विदेश से 150 चिकित्सको ने इसमें भाग लिया। कार्यशाला की आयोजक डॉ चेतना शमसेरी ने बताया कि 15 प्रदेशो के चिकित्सकों कैडेबर माडल पर 150 चिकित्सको को इस विधि कोअल्ट्रासाउंड के द्वारा किस मरीज पर सर्जरी के दौरान किसको कितना लेबल का डोज देना है उसका प्रशिक्षण दिया गया।इस तरह की तकनीक का प्रयोग संस्थान में एक वर्ष से हो रहा है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

कोराना काल में मरीज की सर्जरी करने में परेशानी होती थी क्योंकि पूरे शरीर में एनिस्थिसिया देने से पहले मरीजों को वेंटीलेटर पर रखना पड़ता था लेकिन इस नयी तकनीक आने पर अब इस तरह की रिस्क खत्म हो गयी हैं।प्रो धीमन ने एनिस्थिसिया के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो पी के सिंह,प्रो सुरेन्द्र कुमार सिंह,प्रो एस पी अम्बेश,प्रो प्रभात तिवारी को भी सम्मानित किया।

 

 

 

 

 

 

 

 

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