लखनऊ। किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में मरीजों को दी जाने वाली सस्ती दवाओं की ब्लैक करने का खेल चल रहा है। आरोप है कि कुछ कर्मचारी मिलीभगत कर बाहरी लोगों को नामचीन कंपनियों की मिलने वाली सस्ती दवाएं बेची जा रही हैं। इसकी जानकारी मिलने पर केजीएमयू प्रशासन ने पांच सदस्यीय कमेटी गठित करके जांच के निर्देश दे दिये है। कमेटी ने तेजी से काम करते हुए शुक्रवार से जांच शुरू कर दी है।
केजीएमयू में मरीजों को सस्ती दवाएं देने के लिए हॉस्पिटल रिवॉल्विंग फंड (एचआरएफ) के मेडिकल स्टोर गांधी वार्ड, मेडिसिन विभाग, सर्जरी विभाग, बाल रोग, पीडियाट्रिक सर्जरी, न्यूरो सर्जरी, क्वीनमेरी, शताब्दी अस्पताल के अलावा ट्रॉमा सेंटर सहित कुछ अन्य विभागों में संचालित हैं। इसमें उच्चस्तरीय दवाएं और सर्जिकल सामान मरीजों को 60 से 80 प्रतिशत कम शुल्क पर दिया जाता है।
केजीएमयू में नियमानुसार यह दवा डाक्टरों के पर्चे पर लिखने के बाद ही इन मेडिकल स्टोर पर दी जाती है। बताया जाता है कि कुछ विभागों में सस्ती दवाओं को वहां के कर्मचारियों की मिलीभगत कर बाहरी लोगों को बेची जा रही है। यह सस्ती दाम पर बड़ी कंपनियों की दवाएं बिक रही हैं। मामला तब पकड़ में आया जब कुछ खास महंगी दवाओं की बिक्री में अचानक ज्यादा होने लगी। आया। इसकी शिकायतें भी हो चुकी है। केजीएमयू प्रशासन ने शिकायत को गंभीरता से लिया। कुलपति डॉ. बिपिन पुरी ने आनन-फानन में पांच सदस्यीय जांच कमेटी गठित कर दी। इसमें एचआरएफ के चेयरमैन डॉ. अब्बास अली मेंहदी, डॉ. एचएस पहवा, चीफ प्रॉक्टर डॉ. क्षितिज श्रीवास्तव समेत दो अन्य सदस्य शामिल हंै। शुक्रवार को कमेटी ने तत्काल मामले की जांच भी शुरू कर दी। कमेटी ट्रॉमा सेंटर स्थित एचआरएफ के मेडिकल स्टोर गई। इसके बाद शताब्दी अस्पताल में टीम गई। दवाओं दवाओं के बिक्री संबंधी दस्तावेजों की जांच शुरु हुई, तो पाया गया कि कुछ कर्मचारियों की ड्यूटी के दौरान ही कुछ खास महंगी दवाओं की बिक्री बढ़ जाती है। जांच में मरीजों के पंजीकरण के अनुसार बिकी दवाओं के स्टॉक में भी खामियां मिली है। कमेटी की संस्तुति के बाद नौ संविदा कर्मचारियों को नौकरी से हटा दिया गया है। आैर अब विस्तृत जांच की जा रही है।












