लखनऊ। अल्ट्रासाउंड गर्भस्थ शिशु की स्थिति देखने का सटीक उपकरण है, परन्तु इसके संचालन के लिए विशेषज्ञ होना आवश्यक है। अल्ट्रासाउंड से गर्भस्थ शिशु की संरचना का आकलंन करके बीमारियों का पता लगाया जा सकता है, जोकि जन्म लेने के बाद शिशु के जीवन व परिजनों को दिक्कत कर सकती है। यह जानकारी अमरीका से आयी एनई कैनेडी ने इंडियन फेडरेशन आफ अल्ट्रासाउंड इन मेडिसिन एंड बायोलॉजी कार्यशाला के दूसरे दिन दी। कन्वेंशन सेंटर में आयोजित कार्यशाला में अल्ट्रासाउंड विशेषज्ञों ने विभिन्न बीमारियों की पहचान व बचाव की जानकारी दी।
डा. कैनेडी ने बताया कि 11 से14 हफ्ते में गर्भस्थ स्थिति बहुत कुछ बताने लगती है। इसमें आम तौर पर हार्टबीट के अलावा जन्मजात विकृति को देखा जाता है, पर अगर जांच कर रहा एक्सपर्ट है तो गर्भस्थ शिशु के आकार का गहन अध्ययन करके मंद बुद्धि है या नहीं। इसकी जानकारी मिल सकती है। डा. विक्रम ने बताया कि बच्चेदानी में अगर गांठ बन जाती है तो उसे सर्जरी करके निकाल दिया जाता है, पर अगर महिला की उम्र कम है आैर गांठ भी पांच सीएम से छोटी है तो उसे निकालना नहीं है। महिला की उम्र अधिक तो समय-समय पर गंाठ की जांच कराना चाहिए।
दुबई से आये डा. रवि कदासने ने कहा कि अक्सर देखा गया कि प्रत्येक पेट का दर्द अपेडिंस नही होता है। आपरेशन से पहले अल्ट्रासाउंड करा लेना चाहिए, ताकि ऐसे में कोई आैर बीमारी हो पता चल जाए। फिर भी काफी लोग बिना जांच के सर्जरी कर देते है। दिल्ली के डा. अशोक खुराना ने कहा कि 27 से 28 हफ्ते के बीच गर्भस्थ शिशु का फेफड़े विकसित होते है। इस दौरान उनको अल्ट्रासाउंड से देखा जा सकता है कि शिशु को श्वसन प्रक्रिया में दिक्कत तो नहीं है। इसी प्रकार बैगलौर के डा. बीएस राममूर्ति ने भी शिशु का कार्डियक बीमाारी की जानकारी दी।












