लखनऊ। एसजीपीजीआई के न्यूरोसर्जरी विभाग ने बनाया स्पाइन-ड्रिलिंग के लिए एक नया और सुरक्षित डिवाइस
स्पाइन-ड्रिलिंग सेफ्टी डिवाइस एक नया उपकरण है जिसे स्पाइनल सर्जरी के दौरान मरीज़ की सुरक्षा बढ़ाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इस डिवाइस को एसजीपीजीआई, लखनऊ के न्यूरोसर्जरी विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. वेद प्रकाश मौर्य ने डिज़ाइन किया है और इसका पेटेंट भी कराया है।
यह नया (स्पाइन ड्रिलिंग सेफ्टी डिवाइस) उपकरण ‘स्प्लिट कॉर्ड मैलफॉर्मेशन टाइप-1’ (स्पाइनल कॉर्ड की एक दुर्लभ जन्मजात समस्या) में बोनी स्पर (हड्डी का बढ़ा हुआ हिस्सा) की सुरक्षित ड्रिलिंग के लिए उपयोगी है। यह समस्या ज़्यादातर बच्चों में देखी जाती है, खासकर तेज़ी से बढ़ते समय, जब बोनी स्पर स्पाइनल कॉर्ड को नुकसान पहुँचाने लगता है। स्पाइन की सर्जरी के दौरान, बढ़ते हुए स्पाइनल कॉर्ड को नुकसान से बचाने के लिए इस बोनी स्पर को हटा दिया जाता है। इस डिवाइस का मकसद बोनी स्पर की ड्रिलिंग के दौरान सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत देना है।
यह स्पाइनल कॉर्ड की ओर गर्मी के ट्रांसमिशन को कम करता है और ड्रिल और न्यूरल टिश्यू के बीच गलती से होने वाले सीधे संपर्क को कम करता है। स्पाइनल डिसरैफिज्म के सबसे ज़्यादा मामले उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों में देखे जाते हैं। भारत सरकार ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के साथ मिलकर, इन प्रभावित राज्यों में स्पाइनल डिसरैफिज्म को खत्म करने के लिए कई कदम उठाए हैं, जिसमें फोलेट (विटामिन B9) के साथ फूड फोर्टिफिकेशन भी शामिल है। यह इनोवेशन यूनिट चीफ प्रो. अरुण कुमार श्रीवास्तव के लगातार मार्गदर्शन और न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रमुख प्रो. अवधेश कुमार जायसवाल के कुशल नेतृत्व के कारण संभव हो पाया।
इस नए डिवाइस को भारत सरकार के इंडियन पेटेंट ऑफिस से पेटेंट सर्टिफिकेशन मिला है और इसे आखिरकार रूटीन स्पाइनल सर्जिकल प्रैक्टिस में शामिल किया जाएगा। एसजीपीजीआई के निदेशक प्रो. (पद्म श्री) आर.के. धीमन ने इस उपलब्धि के लिए न्यूरोसर्जरी विभाग को बधाई दी। उन्होंने स्वदेशी मेडिकल इनोवेशन, सर्जिकल रिसर्च और मरीज़ की सुरक्षा के प्रति लगातार प्रतिबद्धता के महत्व पर भी ज़ोर दिया।












