लखनऊ। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) में तदर्थ (Ad-hoc) नियुक्तियों और उनके विनियमितीकरण को लेकर चल रहा विवाद अब बेहद गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। इस पूरे मामले की शिकायतें शासन स्तर तक पहुंचने के बाद अब आधिकारिक जांच शुरू हो गई है। शासन ने इस संबंध में केजीएमयू प्रशासन को एक कड़ा पत्र भेजकर विस्तृत जवाब तलब किया है, जिससे संस्थान के प्रशासनिक गलियारों में खलबली मच गई है।
क्या हैं मुख्य आरोप?
शिकायतों के अनुसार, केजीएमयू में कई कर्मचारियों को नियमों और तय प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर तदर्थ आधार पर नियुक्तियां दी गईं। मामला सिर्फ यहीं नहीं रुका, बल्कि बाद में इन तदर्थ कर्मचारियों को नियमित (Regular) कर्मचारियों की तरह ही:
वरिष्ठता (Seniority)
पदोन्नति (Promotion)
वेतनमान (Pay Scale) और अन्य सभी सेवा लाभ अवैध रूप से दे दिए गए।
आरोप है कि इन नियमों की अनदेखी के कारण सरकारी खजाने पर अतिरिक्त और अनावश्यक वित्तीय भार पड़ा है। इसके साथ ही कुछ शिकायतों में रिकॉर्ड में हेरफेर करने और महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने के भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
शासन ने केजीएमयू प्रशासन से पूछे तीखे सवाल
शासन द्वारा भेजे गए पत्र में केजीएमयू प्रशासन से मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा गया है:
विनियमितीकरण का आधार क्या था?: जिन कर्मचारियों को तदर्थ (Ad-hoc) आधार पर नियुक्त किया गया था, उन्हें किस नियम, शासनादेश (Government Order) या कानूनी प्रक्रिया के तहत नियमित सेवा में शामिल किया गया?
समान लाभ देने का औचित्य?: तदर्थ कर्मचारियों को नियमित कर्मियों के समान वेतनमान और पदोन्नति जैसे लाभ देने का कानूनी आधार क्या था?
असर: शासन के इस कड़े रुख के बाद केजीएमयू के संबंधित विभागों में हड़कंप का माहौल है। अब देखना यह होगा कि केजीएमयू प्रशासन इस पत्र का क्या जवाब देता है और जांच की आंच कहां तक पहुंचती है।












