लखनऊ। युवा आबादी में कार्डियक बीमारी और हार्ट अटैक तेजी से वृद्धि हुई है। इनमें मायोकार्डियल इंफार्क्शन (एमआई) या जिसे आमतौर पर हार्ट अटैक के रूप में जाना जाता है। ज्यादातर यह 45 वर्ष से अधिक उम्र में होता है। अब यह आज के युवाओं में भी तेजी से बढ़ रहा है।
यह जानकारी किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के लॉरी कार्डियोलॉजी विभाग के वरिष्ठ डॉ ऋषि सेठी ने दी। उन्होंने परामर्श दिया कि युवाओं में कार्डियक बीमारियों व हार्ट अटैक की घटनाओं को रोकने और कम करने में विशेष डाक्टरों से परामर्श लेना चाहिए। इसके लिए अत्याधुनिक दवाएं व संसाधन अब मौजूद है।
डा ऋषि सेठी ने बताया कि हार्ट अटैक तब होता है जब हृदय की कोरोनरी धमनी में रक्त का प्रवाह कम हो जाता है या रुक जाता है, जिससे हृदय की मांसपेशियों को नुकसान होता है। ज्यादातर मरीज दिल के दौरे और आकस्मिक हृदय गति का बंद होने के मध्य भ्रमित हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि हार्ट अटैक के पहले कई लक्षण या संकेत होते हैं, जो पहचानने में मदद कर सकते हैं कि उसे दिल का दौरा पड़ने का खतरा हो सकता है। अक्सर लोग नियमित हृदय जांच नहीं करवाते है। यह निर्धारित करने के लिए कि उनके हृदय की मांसपेशियां कितनी क्षतिग्रस्त हैं।
डॉ. सेठी बताते है कि आज वर्तमान में युवा व अन्य लोगों के बीच आहार में पोषक तत्वों की कमी है, सोने के घंटे अनिश्चित हैं, शारीरिक गतिविधि सीमित है आदि। यह कई तरह की कार्डियक बीमारियों को जन्म देते हैं। शुरूआती दौर में सही जांच व इलाज न होने से आैर हालत गंभीर हो जाती है। जैसे कि रक्त के थक्के या थ्रोम्बस का बनना, जिससे कोरोनरी धमनियों में रुकावट हो सकती है। उन्होंने बताया कि युवा रोगियों में हार्ट अटैक के साथ-साथ अचानक कार्डियक अरेस्ट भी देखा जा रहा है। अचानक हृदय की गति बंद होना, एक शारीरिक के अंदर की अलग समस्या है। इसमें मस्तिष्क और अन्य अंगों तक रक्त की आपूर्ति लगभग तुरंत रोक देती है। यदि घटना के बहुत कम समय के भीतर तत्काल इलाज नहीं किया जाता है, तो इसका परिणाम आकस्मिक मृत्यु हो सकती है। उनका कहना है कि अब नयी तकनीक के तहत सबक्यूटेनियस इंप्लांटेबल डिफाइब्रिलेटर सिस्टम (एस-आईसीडी) को प्रयोग किया जा सकता है। एस-आईसीडी सिस्टम पहला और एकमात्र सबक्यूटेनियस इंप्लांटेबल डिफ्रिब्रलेटर है। यह अचानक आकस्मिक हृदय गति बंद होने से सुरक्षा प्रदान करता है। किसी भी तेज या अनियमित हार्ट बीट का पता लगाने के लिए या हृदय गति और लय की निगरानी के लिए उपकरणों को स्थायी रूप से छाती के अंदर या त्वचा के अंदर स्थापित किया जा सकता है। आज चिकित्सकीय प्रगति ने इस तरह से आकस्मिक खतरनाक दिल से संबंधित होने वाली मौतों की कड़ी को रोकना संभव बना दिया है।












