लखनऊ। पानी में आर्सेनिक की मात्रा ज्यादा होने से त्वचा की बीमारी सहित कई अन्य बीमारियों का होती है, इन बीमारियों का कोई ठोस इलाज नहीं होता है। अब इसकी दवा को खोजने का दावा किया जा रहा है। इसकी दवा का क्लीनकल ट्रायल चल रहा है। जल्द ही यह दवा बाजार में उपलब्ध होगी। यह जानकारी प्रो. अब्बास अली मेंहदी ने किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के बायोकेमिस्ट्री विभाग द्वारा एसोसिएशन ऑफ क्लीनिककल बायोकेमिस्ट (एसीबीआईकान- 2017) में दी। चार दिवसीय सम्मेलन के पहले दिन डाक्टरों ने पानी की गुणवत्ता पर चर्चा करते हुए बीमारियों पर चर्चा की। इसके अलावा सोमवार को ब्लड की जांच में मानकों में नार्मल रेंज बनाने के लिए गठित की जाएगी। ताकि भारतीय स्तर पर मरीजों की जांच का स्तर तय किया जा सके।
चार दिनों तक चलने वाले सम्मेलन में रविवार को कलाम सेंटर में प्री वर्कशाप का आयोजन किया गया। इसमें डाक्टरों को लैब में जांच व उनकी तकनीक की जानकारी भी दी गयी। सम्मेलन में आयोजक सचिव प्रो. अब्बास अली मेहदी ने बताया कि पश्चिम बंगाल, बिहार के बाद यूपी के घाघरा नदी वाले क्षेत्रों में आर्सेनिक व फ्लोराइड की मात्रा बहुत पायी जाती है। इससे होने वाली बीमारियों से जांच के लिए लगातार शोध चल रहा है। रायबरेली के शोध संस्थान की वैज्ञानिक एस जे एस फ्लोरा ने एक दवा का इजाद किया है। यह दवा काफी कारगर है। इसका क्लीनिकल ट्रायल चल रहा है। प्रो. मेहदी ने बताया कि देश भर से आ रहे देशी व विदेशी वैज्ञानिक व डाक्टरों के निर्देशन में एक कमेटी का गठन किया जा रहा है। यह कमेटी बायोकेमिस्ट्री जांच में मानकों भारतीय स्तर नार्मल रेंज को तय करेगी। यह निर्णय ऐतिहासिक होगा अौर इसके दूरगामी परिणाम होगे।












