पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन, हरिद्वार में पांडुलिपियों का निवारण एवं संरक्षण विषय पर पाँच दिवसीय कार्यशाला का आयोजन
हरिद्वार। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय (MoC) की मुख्य पहल “ज्ञानभारतम् मिशन” के अंतर्गत, पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन, हरिद्वार में आयोजित पांडुलिपियों का निवारण एवं संरक्षण पर पंचदिवसीय कार्यशाला पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन, हरिद्वार में आयोजित की गई। इसी क्रम में, संस्कृति, धरोहर, संरक्षण और उन्हें स्थिर करने की वैज्ञानिक विधियों पर केंद्रित रहा। कार्यक्रम में संस्कृति मंत्रालय के अधिकारियों, विशेषज्ञों तथा प्रतिनिधियों ने भाग लिया। मुख्य अतिथियों का स्वागत माला और स्मृति चिह्न भेंट करके किया गया।
इस पंचदिवसीय शृंखला के पाँचवे दिवस श्रद्धेय आयुर्वेद शिरोमणि आचार्य बालकृष्ण ने देश की मूल संस्कृति व मूल प्रकृति को समझने का उद्घोष करते हुए कहा कि जीर्ण-क्षीर्ण पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण का उद्देश्य हमारी प्राचीन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना है। उन्होंने रेखांकित किया कि केवल संरक्षण ही नहीं बल्कि प्राचीन पांडुलिपियों के साथ-साथ नए लेखन कार्य को भी बढ़ावा देना आवश्यक है। उन्होंने आह्वान किया कि 400-500 वर्ष पुरानी पांडुलिपियों को संशोधित एवं पुनर्संरक्षित करके उन्हें नए स्वरूप में प्रस्तुत किया जाए ,ताकि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर बन सकें।
पतंजलि के प्रयासों का उल्लेख करते हुए आचार्यश्री ने साक्ष्य-आधारित इतिहास लेखन की दिशा में किए जा रहे कार्यों को साझा किया। उन्होंने यह भी कहा कि पांडुलिपियों केवल पुरातन दस्तावेज नहीं हैं अपितु वे हमारी संपदा, संस्कृति व ज्ञान का अमूल्य भंडार हैं, जिन्हें संरक्षित करना आवश्यक है।
संस्कृति हमें सिखाती है कि हम कौन हैं, धरोहर हमें बताती है कि हम कहाँ से आए हैं और संरक्षण सुनिश्चित करता है कि हम अपनी पहचान के साथ कहाँ जा रहे हैं। उन्होंने भारतीय शिक्षा बोर्ड की विषयवस्तु में पांडुलिपियों को अध्याय रूप में समावेश करने की बात कहीं। उनका मानना है कि इन्हें सुरक्षित और संरक्षित रखना एक विकसित एवं जागरूक समाज की पहचान है। कृषि मृदा अनुसंधान की वैज्ञानिक डॉ० मनोहारी राठी ने प्रतिनिधियों को भारत में पाई जाने वाली आठ प्रमुख प्रकार की मिट्टियों, मृदा परीक्षण की प्रक्रियाओं तथा पतंजलि द्वारा विकसित धरती का डॉक्टर ऑटोमेटेड मृदा परीक्षण मशीन के बारे में जानकारी दी।
पांडुलिपियों के संरक्षण में माइक्रोफिल्मिंग एवं फोटोग्राफिक तकनीकों की महत्ता पर बल देते हुए उन्होंने नमी से बचाव के प्रभावी उपायों का प्रायोगिक प्रदर्शन भी किया। उन्होंने बताया कि हस्तलिपियों की साज-सज्जा, बाइंडिंग तथा सुरक्षित प्रबंधन के लिए विशेष उपकरणों एवं सामग्री का उपयोग आवश्यक है। इससे पांडुलिपियों को भौतिक व प्राकृतिक क्षति, कीट-पतंगों, धूल तथा अन्य प्रभावों से सुरक्षित रखा जा सकता है।
कार्यक्रम के समापन पर पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन की विभागाध्यक्ष डॉ. वेदप्रिया आर्या ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। इसके बाद पतंजलि योगयात्रा पर आधारित एक प्रेरणादायक डॉक्युमेंट्री का प्रदर्शन किया गया।












