नयी तकनीक से अस्थमा का बेहतर इलाज
लखनऊ। अस्थमा एक गंभीर श्वसन रोग है, जो मरीजों की रोजमर्रा की जिंदगी पर गहरा असर डालता है। इसमें श्वसन नलिकाओं में सूजन आ जाती है, जिससे सांस लेने में तकलीफ, सीने में जकड़न और लगातार खांसी जैसी समस्याएं होने लगती हैं। कई मरीजों को सामान्य चलने-फिरने में भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। यह जानकारी केजीएमयू के पल्मोनरी एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष डॉ. वेद प्रकाश ने दी।
उन्होंने बताया कि तेजी से बढ़ता वायु प्रदूषण अस्थमा मरीजों के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। हवा में मौजूद सूक्ष्म कण फेफड़ों में गहराई तक पहुंचकर सूजन बढ़ाते हैं, जिससे अस्थमा अटैक का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। इसका असर खासतौर पर बच्चों और बुजुर्गों में अधिक देखा जा रहा है।
तकनीक बनी राहत का जरिया
डॉ. वेद प्रकाश ने कहा कि आधुनिक तकनीक अस्थमा नियंत्रण में अहम भूमिका निभा रही है।
स्मार्ट इनहेलर दवा लेने का सही समय बताते हैं।
डिजिटल स्पाइरोमीटर फेफड़ों की क्षमता की निगरानी करते हैं।
मोबाइल हेल्थ ऐप्स मरीजों को सांस की स्थिति ट्रैक करने और अटैक का अलर्ट देने में मदद करते हैं।
एयर प्यूरीफायर और वियरेबल डिवाइस प्रदूषण स्तर मापकर सतर्क रहने में सहायक हैं।
अस्थमा के प्रमुख लक्षण
सांस लेने में दिक्कत
घुटन महसूस होना
सीने में जकड़न या दर्द
लगातार खांसी, खासकर रात या सुबह
सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज
जल्दी थकान होना
बचाव के उपाय
धूल, धुआं और प्रदूषण से बचें
डॉक्टर की सलाह अनुसार दवाएं नियमित लें
पालतू जानवरों के बाल और परागकण से दूरी रखें
घर को साफ और हवादार रखें
मौसम बदलने पर विशेष सावधानी बरतें
विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर इलाज, प्रदूषण से बचाव और तकनीक के सही इस्तेमाल से अस्थमा को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।












