बन रहा है तिथियों का विशेष संयोग
लखनऊ। सनातन परंपरा में दीपोत्सव के दूसरे दिन मनाया जाने वाला ‘नरक चतुर्दशी’ का पर्व इस वर्ष तिथियों के अनूठे संयोग के साथ आ रहा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली, रूप चतुर्दशी और रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को धूमधाम से मनाया जाता है।
7 और 8 नवंबर को तिथियों का विशेष गणित
अलीगंज, लखनऊ स्थित स्वास्तिक ज्योतिष केन्द्र के ज्योतिषाचार्य एसएस नागपाल ने बताया कि काशी के पंचांग के अनुसार इस वर्ष चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर 2026 को प्रातः 11:44 बजे से प्रारंभ हो रही है। यह तिथि अगले दिन 8 नवंबर को प्रातः 10:51 बजे तक रहेगी, जिसके तुरंत बाद अमावस्या तिथि (मुख्य दिवाली) लग जाएगी।
शास्त्रों में सूर्योदय कालीन तिथि (उदयातिथि) का विशेष महत्व माना गया है। अतः उदयातिथि की मान्यता के अनुसार, अभ्यंग स्नान 8 नवंबर को किया जाएगा।
बुराई पर अच्छाई की जीत और नरकासुर वध का प्रसंग
यह पर्व मुख्य रूप से बुराई पर अच्छाई की जीत और अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने आततायी और क्रूर राक्षस नरकासुर का वध करके 16,000 बंदी नारियों को मुक्ति दिलाई थी। इसी खुशी में दीप जलाकर उत्सव मनाने की परंपरा शुरू हुई। इस दिन भगवान श्री कृष्ण की विशेष पूजा-अर्चना और उपासना करने का विधान है।
अभ्यंग स्नान और यम दीपदान का धार्मिक महत्व
ज्योतिषाचार्य एसएस नागपाल के अनुसार, नरक चतुर्दशी के दिन दो प्रमुख धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं:
अभ्यंग स्नान (प्रातःकाल): मान्यता है कि इस दिन प्रातःकाल शरीर पर उबटन (तिल का तेल और जड़ी-बूटी) लगाकर स्नान करने से रूप और सौंदर्य में वृद्धि होती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस स्नान से पापों का नाश होता है और व्यक्ति को नरक का मुंह नहीं देखना पड़ता।
यम दीपदान (सायंकाल): इस दिन शाम के समय यमराज के नाम से घर के बाहर मुख्य द्वार पर चौमुखा दीपक (यम दीपक) जलाने की परंपरा है। ऐसा करने से परिवार के सदस्यों की अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है और यमदेव की कृपा बनी रहती है।












