लखनऊ। बाराबंकी के रहने वाले मनोज कुमार (35) ने दुनिया से जाते-जाते तीन लोगों के बुझते चिरागों को नया जीवन दे दिया। संस्थान में ब्रेन डेड घोषित किए गए मनोज के परिजनों ने बेहद कठिन घड़ी में अंगदान का साहसिक फैसला लिया। इस ऐतिहासिक निर्णय के साथ ही डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (RMLIMS) में पहली बार किसी ब्रेन डेड व्यक्ति का अंगदान सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
25 अगस्त को भर्ती हुए थे मनोज, रिकवरी न होने पर घोषित किया ब्रेन डेड
मनोज कुमार को 25 अगस्त को गंभीर हालत में लोहिया संस्थान में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों की भरसक कोशिशों के बावजूद उनकी सेहत में सुधार नहीं हुआ। मेडिकल प्रोटोकॉल के तहत डॉक्टरों की विशेषज्ञ टीम ने जांच के बाद उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया।
इसके तुरंत बाद संस्थान के ग्रीफ काउंसलर और ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर ने परिजनों को अंगदान के महत्व के बारे में समझाया, जिस पर परिवार ने मानवता की मिसाल पेश करते हुए सहमति जताई।
SGPGI और लोहिया संस्थान के बीच ग्रीन कॉरिडोर्स: ऐसे बांटे गए अंग
ग्रीन कॉरिडोर और मेडिकल टीमों के आपसी समन्वय से मनोज के अंगों को तुरंत संबंधित अस्पतालों तक पहुंचाया गया:
लिवर और पहली किडनी: संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGI) भेजे गए, जहां जरूरतमंद मरीजों को प्रत्यारोपित किया गया।
दूसरी किडनी: लोहिया संस्थान में ही अयोध्या की 44 वर्षीय महिला मरीज में सफलतापूर्वक ट्रांसप्लांट की गई।
यूरोलॉजी और नेफ्रोलॉजी टीम ने मिलकर पूरा किया ।
ऐतिहासिक ट्रांसप्लांट
निदेशक प्रो. डॉ. सी.एम. सिंह और मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (CMS) डॉ. विक्रम सिंह के मार्गदर्शन में इस पूरे ऑपरेशन को अंजाम दिया गया। यूरोलॉजी, नेफ्रोलॉजी और एनेस्थीसिया विभाग की संयुक्त टीमों ने समयबद्ध और सुरक्षित तरीके से अंग निकालने और ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया पूरी की।
”जाते-जाते भी कई जिंदगियों में उम्मीद दे गए मनोज”
परिजनों (संतोष मिश्रा और लक्ष्मण तिवारी) का कहना है कि मनोज भले ही अब उनके बीच नहीं हैं, लेकिन तीन अलग-अलग शरीरों में वे आज भी जीवित हैं। इस फैसले से मनोज की आत्मा को शांति मिलेगी और यह समाज के लिए भी एक बड़ी प्रेरणा बनेगा।












