हरिद्वार । देश में पहली बार जनजातियों की जियो टैगिंग डेटा भी पतंजलि ने किया।
पतंजलि की टीम को पांच जिलों में जहां जनजातियां रहती है, वहां उनकी जानकारी जुटाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। घुमंतू प्रवृति वाले जनजातियों का एक जगह बसेरा नहीं था। लिहाजा इनसे जानकारी हासिल करना आसान नहीं था। इसी कड़ी में आदिवासी और जनजातीय परिवारों की पतंजलि की टीम ने जियो टैगिंग की। जो अब तक भारत में कहीं भी किसी ने नहीं की है। सरकाअर भी 50 हजार जनजातीय परिवार की मौजूदगी की बात कहते आ रही थी। लेकिन पतंजलि ने ही बताया कि 28 हजार के करीब जनजातीय परिवार यहां रहता है।
इसके अलावा, इन जनजातीय परिवारों को कृषि, व्यवसाय, नौकरी-पेशा से जोड़ने का प्लेटफार्म भी पतंजलि ने ही उपलब्ध कराया। जनजातियां समुदायों को अपने प्रोडक्ट को अन्रदाता एप के माध्यम से बिना किसी बिचौलिये के अपने उत्पाद को बेच का माध्यम भी पतंजलि ही बना।
अमूमन हर बीमारी का जनजातीय लोग कर रहे थे इलाज
पतंजलि टीम के अध्ययन के दौरान देखने में आया कि जनजातीय लोग पेट दर्द, कोल्ड-कफ, कान-गला, बुखार, मधुमेह, धाव-चोट, दांत दर्द, डायरिया, मलेरिया-डेंगू, पाइल्स, उल्टी-दस्त, अस्थमा-मुंह के छाले, हडि्डयों को जोड़ना, किडनी में पथरी, आंख सहित कई अन्य बीमारियों का उपचार कर रहे थे। इसमें सबसे अधिक उपचार जनजातीय क्षेत्रों के लोग ज्वाइंट पेन और अर्थराइटिस में करते थे












