लखनऊ। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. सूर्यकान्त को राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई है। *देश में गंभीर क्षय रोग (टीबी) मरीजों के बेहतर उपचार के लिए “टीबी कमिटेड आईसीयू” हेतु स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) एवं गाइडलाइन तैयार करने के लिए गठित राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति का चेयरमैन बनाया गया है।* यह समिति राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीइपी), स्वास्थ मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत कार्य करेगी गम्भीर टीबी मरीजों के उपचार के लिए आईसीयू बनाने की मानक प्रणाली विकसित करेगी।
ज्ञात रहे कि टीबी के वे गंभीर रोगी, जिन्हें आईसीयू की आवश्यकता होती है, उन्हें जनरल आईसीयू में नहीं रखा जा सकता हैय उनके लिए विशेष रूप से निर्मित आईसीयू की आवश्यकता होती है। डॉ. सूर्यकान्त कई वर्षों से टीबी से होने वाली मृत्यु दर को कम करने के लिए गंभीर प्रयास कर रहे हैं, जिसमें एक प्रमुख कार्य टीबी आईसीयू की स्थापना भी शामिल है। डॉ. सूर्यकान्त ने बताया कि टीबी के वे रोगी, जिनका ऑक्सीजन स्तर 90 प्रतिशत से कम होता है।
उन्हें टीबी आईसीयू की आवश्यकता होती है। कुछ महीने पहले स्वास्थ्य मंत्रालय, भारत सरकार ने एक आदेश पारित किया है कि देश के प्रत्येक मेडिकल कॉलेज में टीबी आईसीयू सुविधा युक्त कम से कम एक बेड अवश्य होना चाहिए। इसी क्रम में यह समिति बनाई गई है।
केजीएमयू की कुलपति डॉ. सोनिया नित्यानन्द ने टीबी कमिटेड आईसीयू हेतु गठित राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति के चेयरमैन बनाए जाने पर डॉ. सूर्यकान्त को बधाई दी और उनके कार्यों की सराहना भी की।
डॉ. सूर्यकान्त ने ड्रग-रेजिस्टेंट टीबी के क्षेत्र में केजीएमयू के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग को अंतरराष्ट्रीय पहचान भी दिलाई है। रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग को विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं इंटरनेशनल यूनियन अगेंस्ट ट्यूबरकुलोसिस द्वारा सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर ड्रग-रेजिस्टेंट टीबी केयर चुना गया है। जिसके तहत टीबी मरीजों का उत्तम उपचार प्रदान किया जाता है। साथ ही पल्मोनरी रिहैबिलिटेशन केंद्र के डा0 सूर्यकान्त संस्थापक प्रभारी भी है। जो उत्तर प्रदेश का का पहला सरकारी केंद्र है जहाँ पर साँस से सम्बंधित रोगियों का पूरी तरह से निःशुल्क उपचार किया जाता है। डॉ. सूर्यकान्त ने टीबी के बारे में 4 पुस्तकें हिन्दी में लिखी है।












