लखनऊ। अनुसंधान संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए किया कार्यशाला का सफल आयोजन पीजीआई ने लाइब्रेरी कॉम्प्लेक्स स्थित खुराना सभागार में “अनुसंधान प्रोत्साहन हेतु प्रथम कार्यशाला” का सफल आयोजन किया, जिसमें संकाय सदस्यों, रेजिडेंट डॉक्टरों और शोधार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
सभा को संबोधित करते हुए संस्थान के निदेशक प्रोफेसर आर. के. धीमन ने रोगी देखभाल को आगे बढ़ाने में अनुसंधान के महत्व पर जोर दिया और एक सशक्त अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के लिए पीजीआई की प्रतिबद्धता को दोहराया।
उन्होंने इस बात पर बल दिया कि एसजीपीजीआईएमएस में अनुसंधान की शुरुआत रेजिडेंट डॉक्टरों, शोधार्थियों और युवा संकाय सदस्यों के स्तर पर की जानी चाहिए और नैदानिक संकाय सदस्यों (Clinical faculty) को अनुसंधान के लिए कम से कम 20% समय देना चाहिए। प्रोफेसर धीमन ने युवा संकाय सदस्यों को व्यावहारिक सुझाव दिए, जैसे कि आंतरिक अनुदानों (इंट्राम्यूरल ग्रांट) के साथ अनुसंधान यात्रा शुरू करना और आंतरिक अनुसंधान के परिणामों का उपयोग करके बाह्य अनुदानों (एक्स्ट्राम्यूरल ग्रांट) की योजना बनाना।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि सभी वरिष्ठ शोधकर्ताओं को एक समय में कम से कम 6 पीएचडी छात्रों का मार्गदर्शन करना चाहिए, ताकि उच्च प्रशिक्षित शोधकर्ताओं का एक समूह तैयार हो सके और एसजीपीजीआईएमएस, लखनऊ में उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने के लिए आईसीएमआर, नई दिल्ली में आवेदन किया जा सके। प्रोफेसर शालीन कुमार ने वैज्ञानिक गतिविधियों में युवा शोधकर्ताओं और रेजिडेंट्स की सक्रिय भागीदारी की आवश्यकता पर जोर दिया; उन्होंने इस बात पर बल दिया कि इस संस्थान में किया जाने वाला शोध रोगी स्वास्थ्य देखभाल की बेहतरी से संबंधित हो।
कार्यशाला में जैव चिकित्सा अनुसंधान के प्रमुख क्षेत्रों को कवर करते हुए कई ज्ञानवर्धक सत्र आयोजित किए गए, जिनमें शामिल हैं:
● नैदानिक परीक्षणों का बुनियादी ढांचा और अवसर
● कोर प्रयोगशाला सुविधाएं और साझा अनुसंधान मंच
● एसजीपीजीआईएमएस में पशु अनुसंधान सुविधाएं
● स्टेम सेल अनुसंधान और पुनर्योजी चिकित्सा
● जैव चिकित्सा अनुसंधान केंद्र (सीबीएमआर) के साथ सहयोगात्मक अनुसंधान पहल
कार्यशाला में प्रो. अमित गोयल, प्रो खलिकुर् रहमान, डॉ. आलोक कुमार, डॉ. सी. पी. चतुर्वेदी, डॉ. अतुल गर्ग और श्री श्याम कुमार सहित विशेषज्ञों ने विस्तृत प्रस्तुतियां दीं, जिनमें बहुविषयक अनुसंधान के लिए उपलब्ध अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे और अवसरों पर प्रकाश डाला गया।












