लखनऊ। न्यूरोट्रामा सोसायटी ऑफ इंडिया की गाइडलाइन जारी कर दी गई। लोहिया संस्थान में न्यूरो सर्जरी विभाग के प्रमुख डा. दीपक सिंह ने कहा कि अब गाइडलाइन के अनुसार ही मरीजों का इलाज किया जाएगा। दिमाग की हड्डी को अगर हटाने की नौबत आए, तो 15 बाई 10 सेंटीमीटर की हड्डी को ही हटाया जा सकेगा। इसको हटाने के दो महीने के अंदर नई हड्डी लगाना अनिवार्य होगा। उन्होंने बताया कि गाइडलाइन में इस प्रकार के कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए गए हैं। डा. सिंह शुक्रवार को इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित न्यूरोट्रामा कार्यशाला में सम्बोधित कर रहे थे।
कार्यशाला में देश-विदेश से लगभग 360 न्यूरो विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया, जिन्हें नयी तकनीक की न्यूरो सर्जरी से अपडेट भी किया गया। डा. सिंह ने बताया कि कार्यशाला में गाइड लाइन को जारी करने के बाद राज्य सरकार को भेज दिया गया है, ताकि इसे नियमानुसार आैर बेहतर तरीके से लागू किया जा सके। रीढ़ और सिर की हड्डी को जोड़ने में कारगर है डी प्लेट डा. सिंह ने एक्सीडेंट के कारण अक्सर सिर के पिछले भाग और रीढ़ की हड्डी टूट जाती है। इसको जोड़ना बेहद कठिन होता है। जिस तकनीक से इसको जोड़ा जाता रहा है, उसमें ठीक होने की गुजाइश कम होती है।
इसको समस्या को देखते हुए उन्होंने डी प्लेट नाम से एक डिजाइन बनाई है तो सिर और रीढ़ की हड्डी को गारंटी के साथ जोड़े देती है। इससे फिर कभी इन हड्डियों के अलग होने का खतरा नहीं रहेगा। इससे पिछले डेढ़ सालों में उन्होंने करीब 22 मरीजों की ऐसी सर्जरी की है। अब तक किसी को भी किसी प्रकार की दिक्कत नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि अपनी इस खोज को उन्होंने पेटेंट कराने का दावा किया है।
डा. फरहान ने बताया कि 100 प्रतिशत लोग पर्स को पैंट की पिछली जेब में ही रखते हैं। पर्स में रुपये के अलावा अन्य सामान से काफी मोटा हो जाता है। पीछे की जेब में रखकर लगातार बैठने से वहां की मांशपेशियों और रीढ़ की हड्डी को दिक्कत करती है, जिसकी वजह से न्यूरो की समस्या बढ़ जाती है। इसलिए इससे सजग रहने की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि पर्स जिस ओर रहता है उस पैर की मांशपेशियों को दबाता है। साथ ही पर्स की वजह से लोग थोड़ा तिरछा होकर बैठते हैं। इससे रीढ़ की हड्डी के टेढ़े होने की संभावना बन जाती है।
उन्होंने बताया कि पर्स को पीछे की जेब में रखकर बैठने से बचना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने बताया कि चोट लगने पर सीटी स्कैन जरूर कराएं। संस्थान के डॉ. कुलदीप यादव ने बताया कि एक्सीडेंट के दौरान दिमाग की नसें फट जाती हैं। इससे होने वाली ब्लीडिंग को रोकने के लिए ओपेन सर्जरी करनी पड़ती है। इस स्थिति में इंडोवैस्कुलर विधि से पैर धमनियों से होते हुए दिमाग की इन नसों को बांधा या जोड़ा जाता है।
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