लंबे समय तक टीबी समझकर होता रहा इलाज, जांच में निकला दुर्लभ जर्म सेल ट्यूमर

लखनऊ। सदर स्थित उदयगंज निवासी एक युवती को लंबे समय तक टीबी और सामान्य बीमारी समझकर इलाज दिया जाता रहा, लेकिन असली बीमारी कुछ और निकली। आखिरकार केजीएमयू के डॉक्टरों ने उसके सीने से 2.5 किलोग्राम का विशाल ट्यूमर निकालकर उसे नई जिंदगी दी।
सांस फूलना, सीने में दर्द और तेज धड़कन से बढ़ी परेशानी
शगुन नाम की युवती को जून 2025 में सीने में दर्द, भारीपन, सांस फूलने और दिल की धड़कन तेज होने की शिकायत शुरू हुई। शुरुआत में स्थानीय क्लीनिक पर दवा दी गई, लेकिन आराम नहीं मिला। जनवरी में हालत और बिगड़ गई। सांस लेने में दिक्कत के साथ बुखार आने लगा।
पहले पानी भरने और फिर टीबी का संदेह
एक्सरे में फेफड़े में पानी भरने की आशंका जताई गई, जिसके बाद निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। छाती से पानी निकालकर जांच हुई और टीबी की दवा शुरू कर दी गई। कुछ समय राहत मिली, लेकिन जल्द ही उल्टियां और तबीयत बिगड़ने लगी।
2025 सीटी स्कैन और बायोप्सी में सामने आया सच
दोबारा जांच में सीटी स्कैन और बायोप्सी से पल्मोनरी हैमार्टोमा का संदेह जताया गया। बाद में छह अप्रैल को परिजन मरीज को केजीएमयू लेकर पहुंचे, जहां विशेषज्ञों ने विस्तृत जांच की।
दो लाख में एक मरीज में होता है ऐसा ट्यूमर
केजीएमयू के चिकित्सा अधीक्षक व जनरल सर्जरी विभाग के डॉ. सुरेश कुमार के निर्देशन में जांच हुई। इसमें एंटीरियर मेडियास्टिनम में बड़ा जर्म सेल ट्यूमर (मैच्योर टेराटोमा) मिला। डॉक्टरों के अनुसार यह दुर्लभ ट्यूमर करीब दो लाख में एक मरीज में पाया जाता है।
इस ट्यूमर में मांस, हड्डी और बाल जैसे ऊतक मौजूद थे। यह इतना बड़ा हो चुका था कि:
दायां फेफड़ा पूरी तरह सिकुड़ गया था
दिल और मुख्य धमनी (एओर्टा) पर दबाव था
दिल की नसें जकड़ गई थीं
सांस लेने में गंभीर दिक्कत हो रही थी
पल्स सामान्य से दोगुनी थी
5 घंटे चली जटिल सर्जरी
21 अप्रैल को डॉक्टरों ने ऑपरेशन किया। करीब पांच घंटे चली सर्जरी में 2.5 किलो का ट्यूमर सफलतापूर्वक निकाल दिया गया। ट्यूमर हटते ही सिकुड़ा हुआ फेफड़ा दोबारा फैल गया और मरीज की हालत तेजी से सुधरने लगी।
ICU में निगरानी, अब मिली छुट्टी
ऑपरेशन के बाद मरीज को आईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। नौ दिन बाद सीने की नली हटाई गई और शनिवार को उसे डिस्चार्ज कर दिया गया।
ऑपरेशन टीम में शामिल रहे ये विशेषज्ञ
डॉ. सुरेश कुमार
डॉ. मिथिलेश वर्मा
डॉ. संजीव पूर्ति
डॉ. वैभव अग्रवाल
डॉ. नीतू सिंह
एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉ. विनोद श्रीवास्तव और पैरामेडिकल स्टाफ
क्यों खास है यह मामला?
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय तक बीमारी की पहचान गलत रही। सही समय पर विशेषज्ञ जांच और जटिल सर्जरी से युवती की जान बच सकी।












