जानिए शुभ मुहूर्त और विधि
लखनऊ। देवताओं के महान शिल्पकार और वास्तुकला के देवता भगवान विश्वकर्मा की पूजा आज (17 सितंबर) कन्या संक्रांति के पावन अवसर पर देशभर में धूमधाम से की जा रही है। इस दिन विशेष रूप से कारखानों, दुकानों, वर्कशॉप, मशीनों और निर्माण से जुड़े उपकरणों की पूजा करने की प्राचीन परंपरा है।
सृष्टि के प्रथम वास्तुकार हैं भगवान विश्वकर्मा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा ब्रह्मा जी के पुत्र ‘वास्तु’ की संतान हैं। वे अतुलनीय शिल्प कला के स्वामी हैं। उन्होंने देवताओं की स्वर्णिम लंका, द्वारिका नगरी, पांडवों का इंद्रप्रस्थ, स्वर्ग लोक और कुबेर के महलों का निर्माण किया। इतना ही नहीं, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, शिवजी का त्रिशूल, इंद्र का वज्र, यमराज का कालदंड और पुष्पक विमान भी भगवान विश्वकर्मा द्वारा ही निर्मित हैं।

पूजा का शुभ मुहूर्त और दुर्लभ संयोग
ज्योतिषाचार्य एस.एस.नागपाल (स्वास्तिक ज्योतिष केन्द्र, अलीगंज, लखनऊ) के अनुसार, इस वर्ष विश्वकर्मा पूजा पर सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग का बेहद शुभ संयोग बन रहा है।
सूर्य का राशि परिवर्तन: सुबह 07:58 बजे सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में प्रवेश करेंगे।
संक्रांति पुण्यकाल मुहूर्त: प्रात: 07:58 बजे से दोपहर 02:31 बजे तक (दान-पुण्य और पूजा के लिए श्रेष्ठ)।
उत्तम पूजा मुहूर्त: सुबह 07:58 बजे से दोपहर 01:48 बजे तक।
ग्रह-नक्षत्र स्थिति: अनुराधा नक्षत्र, वृश्चिक राशि का चंद्रमा और षष्ठी तिथि।
सरल एवं संपूर्ण पूजा विधि
तैयारी: सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थान पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विश्वकर्मा की तस्वीर स्थापित करें।
पूजा सामग्री: अक्षत, हल्दी, रोली, फूल, पान, लौंग, सुपारी, फल, मिठाई, धूप-दीप और रक्षासूत्र (कलावा) एकत्र करें।
औजारों का पूजन: जिन मशीनों, गाड़ियों या औजारों की पूजा करनी है, उन पर हल्दी और चावल का टीका लगाएं व रक्षासूत्र बांधें।
कलश स्थापना: कलश पर हल्दी, चावल और कलावा अर्पित कर विधि-विधान से पूजन करें।
आरती व प्रसाद: पूजा संपन्न होने के बाद भगवान विश्वकर्मा की आरती करें और उपस्थित सभी लोगों में प्रसाद का वितरण करें।












