जगन्नाथ रथयात्रा 16 जुलाई को: इस शुभ संयोग में निकलेंगे भगवान जगन्नाथ, जानें महत्व और रथों की खासियत

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​लखनऊ । ओडिशा के पुरी सहित देश के विभिन्न शहरों में आषाढ़ माह की शुक्ल द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा बेहद धूमधाम और उत्सव के साथ निकाली जाती है। इस वर्ष यह पावन रथयात्रा 16 जुलाई को आयोजित होने जा रही है।

​अलीगंज स्थित स्वास्तिक ज्योतिष केन्द्र के ज्योतिषाचार्य एस.एस. नागपाल के अनुसार, इस बार रथयात्रा पर ग्रहों और नक्षत्रों का बेहद शुभ और दुर्लभ संयोग बन रहा है।
​तिथि और शुभ संयोग का समय
​द्वितीया तिथि का प्रारंभ: 15 जुलाई, दोपहर 01:22 बजे से
​द्वितीया तिथि की समाप्ति: 16 जुलाई, दोपहर 11:20 बजे तक
​विशेष ज्योतिषीय संयोग: गुरुवार को चंद्रमा कर्क राशि में रहेगा। चंद्रमा और गुरु की युति से गजकेसरी योग का निर्माण हो रहा है। इसके साथ ही इस दिन सिद्धि योग और रवि योग का भी शुभ संयोग बन रहा है, जो इस दिन के महत्व को कई गुना बढ़ा देता है।

​800 वर्ष से अधिक प्राचीन है इतिहास, तीनों भाई-बहनों के लिए बनते हैं अलग रथ
​चार पवित्र धामों में से एक, पुरी का जगन्नाथ मंदिर 800 वर्ष से अधिक प्राचीन है। इस भव्य रथयात्रा में भगवान श्रीकृष्ण (जगन्नाथ), उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के लिए तीन अलग-अलग विशाल रथ तैयार किए जाते हैं।

​रथयात्रा के क्रम में सबसे आगे बलराम जी का रथ, बीच में देवी सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ का रथ चलता है। इन रथों की अपनी विशेष पहचान है।गुंडीचा मंदिर है भगवान का ‘जन्मस्थान’, क्यों जाते हैं भगवान यहाँ?
​यह रथयात्रा जगन्नाथ मंदिर से शुरू होकर गुंडीचा मंदिर तक पहुँचती है। मान्यता है कि यह परंपरा राजा इंद्रद्युम्न के शासनकाल से चली आ रही है।

​भगवान का विश्राम: आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से नवमी तिथि तक भगवान अपने भाई-बहन के साथ गुंडीचा मंदिर में विश्राम करते हैं।
​विश्वकर्मा जी का संबंध: इसी गुंडीचा स्थान पर देवशिल्पी विश्वकर्मा जी ने भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा जी के विग्रहों (मूर्तियों) का निर्माण किया था। इसीलिए इसे भगवान का जन्म स्थान माना जाता है, जहाँ भगवान वर्ष में एक बार अपनी इच्छा से जाते हैं।
​बहुड़ा यात्रा (वापसी): आषाढ़ शुक्ल दशमी के दिन भगवान गुंडीचा मंदिर से पुनः रथ पर सवार होकर अपने मुख्य मंदिर के लिए प्रस्थान करते हैं।
​रथ खींचने और दर्शन का धार्मिक महत्व
​पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रथयात्रा के दौरान गुंडीचा मंदिर में साक्षात सभी तीर्थ उपस्थित रहते हैं।
​”जो भी श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक भगवान के रथ को खींचता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस अवधि के दौरान वहाँ स्नान, दर्शन और पूजन करने वाले व्यक्ति को सभी तीर्थों का पुण्य लाभ मिलता है और वह जीवन के चारों पुरुषार्थों— अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष को प्राप्त करता है।

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