शुभ योग और शमी पूजन का महत्व
लखनऊ। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजयादशमी यानी दशहरा का पावन पर्व देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी तिथि पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने अधर्म के प्रतीक रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त की थी, वहीं मां दुर्गा ने महिषासुर का संहार कर महिषासुरमर्दिनी अवतार लिया था। यही कारण है कि यह पर्व सर्वदा ‘बुराई पर अच्छाई’ और ‘अधर्म पर धर्म’ की जीत का प्रतीक माना जाता है।

सर्वदोष नाशक ‘रवि योग’ और अबूझ मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य एस.एस. नागपाल (स्वास्तिक ज्योतिष केन्द्र, अलीगंज) के अनुसार, इस बार विजयादशमी पर पूरे दिन सर्वदोष नाशक रवि योग विद्यमान रहेगा। दशहरे का दिन स्वयं सिद्ध अबूझ मुहूर्त माना जाता है, जिसमें बिना किसी पंचांग विचार के कोई भी नया कार्य, व्यवसाय या शुभ अनुष्ठान प्रारंभ करना अत्यंत फलदायी होता है।
विजयादशमी 2026: पूजन एवं विजय मुहूर्त
दशमी तिथि: 20 अक्टूबर
विजय मुहूर्त: दोपहर 01:45 बजे से 02:31 बजे तक
अपरान्ह पूजन मुहूर्त: दोपहर 12:59 बजे से 03:16 बजे तक
पूजन विधियां और परंपराएं
अस्त्र-शस्त्र पूजन: क्षत्रियों के लिए यह अति महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन विजय मुहूर्त में अस्त्र-शस्त्रों के पूजन का विधान है।
अपराजिता एवं शमी पूजन: अपरान्ह काल में ईशान कोण में अपराजिता देवी के साथ जया और विजया देवी की पूजा की जाती है। इसके साथ ही शमी वृक्ष की पूजा और सीमा उल्लंघन (शत्रु क्षेत्र या विजय यात्रा के प्रतीक रूप में) करने की परंपरा है।
नीलकंठ दर्शन: विजयादशमी के दिन नीलकंठ पक्षी का दर्शन करना अत्यंत शुभ और भाग्यवर्धक माना गया है।
पुतला दहन: संध्या समय रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के विशाल पुतलों का दहन किया जाता है।
शमी वृक्ष पूजन की पौराणिक कथाएं
महाभारत काल: अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने अपना धनुष गांडीव एक शमी वृक्ष पर छुपाया था और राजा विराट के यहाँ वृहन्नला का रूप धारण कर समय बिताया था। अज्ञातवास समाप्त होने पर अर्जुन ने शमी वृक्ष से अपने अस्त्र-शस्त्र पुनः उठाकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी।
रामायण काल: भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व शमी वृक्ष की पूजा की थी, जिस पर शमी वृक्ष ने श्रीराम की विजय का उद्घोष किया था। इसी कारण से विजयादशमी के दिन विजय काल में शमी पूजन का विशेष महत्व है।











