लखनऊ। माता-पिता अपने बच्चों को सुबह-सुबह दाल, चावल या आलू, फास्ट फूड चाकलेट देते हैं, उससे बच्चे की किडनी में स्टोन बनाने की आशंका रहती है। यह बात संजय गांधी पीजीआई के इंटरनेशनल पीडियाट्रिक एंड एडोलेसेन्ट यूरोलाजी कार्यशाला के दूसरे दिन पीडियाट्रिक यूरोलॉजिस्ट एवं सचिव प्रो. एमएस अंसारी ने चर्चा में कही। उन्होंने कहा कि बच्चों को संतुलित आहार देना चाहिए। उन्होंने बताया कि गांवों में बच्चों को भूख मिटाने के लिए अक्सर रोटी के साथ शक्कर मिलाकर खिला देते हैं, उनके भी किडनी में पथरी बनने की आशंका रहती हैं।
अब दूरबीन विधि से इलाज होने लगा है –
बच्चों का मन टीवी देखने आैर मोबाइल खेलने में लगता है। ऐसी बच्चों में चुस्ती-फुर्ती कम रहती है। इन बच्चों में पेशाब कम बनता है। जो बच्चे खेलकूद आैर उझल-कूद में आगे रहते हैं, उनमें प्यास आैर भूख लगती है, तो वह आवश्यकता अनुसार पानी पीते हैं। उत्तर भारत में यूरोलिथिसिस एक प्रमुख बीमारी है। 18 वर्ष की आयु के किशोर में पान-मसाला, तम्बाकू के साथ जो लोग चूना लगा कर खाते हैं, उनके भी पथरी बन सकती है। इलाज की तकनीकी के बारे में उन्होंने कहा कि अब दूरबीन विधि से इलाज होने लगा है। इसके अतिरिक्त लैप्रोस्कोपी व इंडोस्कोपी से भी पत्थर निकाले जा सकते हैं।
प्रो. एमएस अंसारी ने बताया कि इंडोस्पोपी तकनीक काफी कारगर है। जिन बच्चों के जन्म से अविकसित जननांग की समस्या से पीड़ित हैं, उनमें आंत के टुकड़े से बच्चेदानी का रास्ता दूरबीन विधि से बनाया जा सकता है। यूरोलॉजी के डा. यूवी सिंह ने कहा कि पेशाब की नयी में गांठ होने पर पेशाब बंद हो सकती है, इससे बच्चे का गुर्दा भी खराब हो सकता है। ऐसे में इंडोस्कोपी की तकनीक से पेशाब की नली में गांठ को काटकर जोड़ देते हैं, इससे बच्चा इस बीमारी से निजात मिलती है।












