साइकिल के हैंडल से अग्न्याशय फटा, विशेषज्ञ डॉक्टरों ने 10 साल के बच्चे को दिया नया जीवन

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​लखनऊ। साइकिल चलाते समय अचानक संतुलन बिगड़ा और हैंडल सीधे पेट में धंस गया—इस भयानक हादसे ने जौनपुर के 10 वर्षीय मोहम्मद नदीम को मौत के मुहाने पर खड़ा कर दिया था। अग्न्याशय (Pancreas) में ग्रेड-4 की गंभीर चोट और पेट में एक लीटर पाचक द्रव भर जाने के बावजूद, लखनऊ स्थित SGPGIMS के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के डॉक्टरों ने एक बेहद जटिल सर्जरी कर मासूम की जान बचा ली है। 19 दिनों तक चले जिंदगी और मौत के संघर्ष के बाद बच्चा पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने घर लौट गया है।

​साइकिल से गिरने के बाद बिगड़ती चली गई हालत
जौनपुर के ग्राम जंगीपुर खुर्द का रहने वाला मोहम्मद नदीम गत 6 अगस्त को साइकिल से गिर गया था। हादसे में उसके पेट पर अंदरूनी चोट आई थी। स्थानीय स्तर पर 4 दिनों तक चले प्राथमिक उपचार के बाद भी जब स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो 10 अगस्त को परिजनों ने उसे एसजीपीजीआई ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया।

​जांच में सामने आई ग्रेड-4 की घातक चोट
अस्पताल में जांच के दौरान डॉक्टरों ने पाया कि मासूम के अग्न्याशय में ‘ग्रेड-4’ की बेहद गंभीर चोट है और आंतरिक रिसाव की वजह से पेट के भीतर लगभग 1 लीटर अग्न्याशयी द्रव (Pancreatic Fluid) जमा हो चुका था। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए डॉक्टरों की टीम ने तुरंत सर्जरी का फैसला लिया।

​जटिल सर्जरी और 24 घंटे वेंटिलेटर का सपोर्ट
11 अगस्त को ट्रॉमा सर्जन प्रो. अमित कुमार सिंह और डॉ. आदित्य सिंह (सीनियर रेजिडेंट) की देखरेख में बच्चे की ‘डिस्टल पैंक्रियाटिको-स्प्लेनेक्टॉमी’ (Distal Pancreaticosplenectomy) की गई।
​क्रिटिकल केयर सपोर्ट: एनेस्थीसिया टीम (डॉ. रफत शमीम, डॉ. गणपत प्रसाद और डॉ. दीक्षा) की मदद से ऑपरेशन के बाद बच्चे को 24 घंटे मैकेनिकल वेंटिलेशन पर रखा गया।
​रिकवरी: क्रिटिकल केयर और ट्रॉमा टीम की बहु-विषयक (Multidisciplinary) निगरानी के बाद 25 अगस्त को बच्चे को पूरी तरह स्वस्थ घोषित कर डिस्चार्ज कर दिया गया।

​समय पर सही अस्पताल पहुंचना सबसे जरूरी: प्रो. आर.के. धीमन
एसजीपीजीआईएमएस के निदेशक प्रो. आर.के. धीमन ने पूरी सर्जिकल और मेडिकल टीम को इस सफलता पर बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह मामला जटिल बाल ट्रॉमा (Pediatric Trauma) के प्रबंधन में संस्थान की विशेषज्ञता और टीमवर्क का मिसाल है। उन्होंने यह भी जोर दिया कि गंभीर आंतरिक चोटों के मामलों में मरीज को बिना देरी किए सही विशेषज्ञ ट्रॉमा सेंटर पहुंचाना ही उसकी जान बचा सकता है।

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