प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाएं ठप होने की कगार पर: महामंत्री अशोक

लखनऊ । प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली नर्सेज का आंदोलन अब बेहद उग्र मोड़ ले चुका है। राजकीय नर्सेज संघ उत्तर प्रदेश के आह्वान पर आज पूरे प्रदेश में नर्सेज ने “काला दिवस” मनाते हुए विरोध प्रदर्शन किया। आंदोलनकारियों ने शासन द्वारा पूर्व में दिए गए समझौता पत्र की प्रतियां जलाकर अपनी भारी नाराजगी जताई।

30वें दिन भी आंदोलन जारी, काली पट्टी बांधकर जताया विरोध
गत 9 अक्टूबर से जारी नर्सिंग संवर्ग का यह शांतिपूर्ण आंदोलन आज 30वें दिन में प्रवेश कर गया। प्रदेश के सभी जनपदों के जिला चिकित्सालयों और मेडिकल कॉलेजों में नर्सेज ने काली पट्टी बांधकर काम किया और अपनी 13 सूत्रीय लंबित मांगों को लेकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। इससे पूर्व, 21 अक्टूबर से प्रतिदिन 2 घंटे का कार्य बहिष्कार किया गया था और 22 अक्टूबर को स्वास्थ्य भवन, लखनऊ का ऐतिहासिक घेराव भी किया जा चुका है।
बड़ा सवाल: उप मुख्यमंत्री के आश्वासन के एक साल बाद भी शासनादेश क्यों नहीं?
आंदोलन का सबसे प्रमुख पहलू यह है कि लगभग एक वर्ष पूर्व माननीय उप मुख्यमंत्री एवं चिकित्सा स्वास्थ्य मंत्री श्री ब्रजेश पाठक द्वारा नर्सेज को ठोस आश्वासन दिया गया था। इसके अलावा, शासन स्तर पर 5 प्रमुख मांगों पर सहमति भी बन चुकी है। इसके बावजूद आज तक कोई भी आधिकारिक शासनादेश (GO) जारी नहीं किया गया, जिससे नर्सिंग स्टाफ में गहरी निराशा और आक्रोश व्याप्त है।
क्या हैं नर्सेज की प्रमुख 13 सूत्रीय मांगें?
राजकीय नर्सेज संघ की प्रमुख मांगों में शामिल हैं:
गृह जनपद में तैनाती: स्थानान्तरण नीति के तहत गृह जनपद में पोस्टिंग।
पदोन्नति (Promotion): लंबे समय से अटकी पदोन्नति की प्रक्रिया जल्द पूरी की जाए।
पालनाघर (Creche) की व्यवस्था: महिला नर्सेज के छोटे बच्चों की देखरेख के लिए अस्पतालों में पालनाघर बने।
सवैतनिक अध्ययन अवकाश: उच्च शिक्षा व प्रशिक्षण के लिए पेड स्टडी लीव दी जाए।
संवर्ग हितों की रक्षा: मेडिकल कॉलेजों में परिवर्तित हो रहे अस्पतालों में मौजूदा संवर्ग के अधिकारों की सुरक्षा हो।
केन्द्रीय भत्ते: केंद्र सरकार की नर्सेज के समान भत्तों का भुगतान किया जाए।
संघ का अल्टीमेटम: “अब आश्वासन नहीं, शासनादेश चाहिए”
राजकीय नर्सेज संघ के महामंत्री अशोक कुमार ने कहा कि नर्सेज लंबे समय से संयम के साथ अपनी सेवाएं दे रही हैं, लेकिन सरकार की चुप्पी और वादाखिलाफी ने उन्हें सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब संघ किसी भी मौखिक आश्वासन को स्वीकार नहीं करेगा; जब तक मांगों से संबंधित शासनादेश जारी नहीं होता, आंदोलन लगातार जारी रहेगा।












