लखनऊ । कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला अहोई अष्टमी का पावन व्रत इस वर्ष 1 नवंबर को मनाया जाएगा। यह व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं। इसके अलावा, निःसंतान महिलाएं भी संतान प्राप्ति की मनोकामना के साथ यह निर्जला व्रत रखती हैं।

अलीगंज स्थित स्वास्तिक ज्योतिष केन्द्र के ज्योतिषाचार्य एस.एस. नागपाल के अनुसार, अहोई अष्टमी के व्रत में प्रदोष व्यापिनी अष्टमी तिथि का महत्व होता है, जिसके कारण 1 नवंबर को ही यह व्रत रखना शास्त्रसम्मत है। इस दिन माता पार्वती के ‘अहोई स्वरूप’ की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
अष्टमी तिथि और पूजा का शुभ मुहूर्त
अष्टमी तिथि की शुरुआत: 1 नवंबर, दोपहर 02:51 बजे से
अष्टमी तिथि का समापन: 2 नवंबर, दोपहर 01:10 बजे तक
पूजा का शुभ मुहूर्त: 1 नवंबर, सायंकाल 05:24 बजे से शाम 06:41 बजे तक
तारों को देखने का समय: सायंकाल 05:48 बजे
अहोई अष्टमी पर चंद्रोदय समय: रात्रि 11:28 बजे
अहोई अष्टमी व्रत एवं पूजा विधि
निर्जला उपवास: इस दिन महिलाएं पूरे दिन बिना अन्न और जल ग्रहण किए कड़ा निर्जला उपवास रखती हैं।
दीवार पर चित्र निर्माण: सायंकाल के समय घर की दीवार पर आठ कोनों वाली एक विशेष पुतली बनाई जाती है। पुतली के पास ही स्याऊ माता और उनके बच्चों के चित्र उकेरे जाते हैं।
कथा का पाठ: सायंकाल के शुभ मुहूर्त में अहोई माता और स्याऊ माता की विधि-विधान से पूजा की जाती है तथा अहोई अष्टमी की व्रत कथा का पाठ सुना जाता है।
अर्घ्य और पारण: शाम को कथा सुनने के बाद, मान्यतानुसार कुछ महिलाएं आकाश में तारों को देखकर तो कुछ महिलाएं देर रात चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपने व्रत का पारण (समापन) करती हैं।












