सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को: जानें श्राद्ध मुहूर्त और शनिश्चरी अमावस्या का दुर्लभ संयोग

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​लखनऊ। आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के बाद आने वाली अमावस्या को ‘पितृविसर्जनी अमावस्या’ या ‘महालया’ कहा जाता है। इस वर्ष सर्वपितृ विसर्जन अमावस्या 10 अक्टूबर को मनाई जाएगी। काशी पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि 09 अक्टूबर की रात्रि 08:58 बजे से प्रारंभ होकर 10 अक्टूबर को रात्रि 08:33 बजे तक रहेगी।

​शनिवार का दिन होने के कारण इस बार यह ‘शनिश्चरी अमावस्या’ का विशेष संयोग बना रही है। इस दिन शनि देव की पूजा-अर्चना करने से शनि संबंधी कष्टों और ग्रह दोषों से मुक्ति मिलती है।


​ज्ञात-अज्ञात पितरों के तर्पण का अंतिम अवसर
ज्योतिषाचार्य एस.एस. नागपाल, स्वास्तिक ज्योतिष केंद्र, अलीगंज के अनुसार जिन परिजनों को अपने पितरों की पुण्यतिथि ज्ञात नहीं है, या जो पितृपक्ष के 15 दिनों में श्राद्ध नहीं कर पाए हैं, वे इस दिन श्राद्ध, दान और तर्पण कर सकते हैं। इस तिथि पर समस्त पितरों का विसर्जन किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन किया गया दान और तर्पण पितृ दोष से मुक्ति दिलाता है और पितर प्रसन्न होकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

​श्राद्ध और तर्पण के शुभ मुहूर्त
शास्त्रों के अनुसार पितृ कार्य के लिए मध्याह्न काल सर्वश्रेष्ठ माना गया है। 10 अक्टूबर के लिए शुभ मुहूर्त निम्नलिखित हैं:
​कुतुप मुहूर्त: दोपहर 11:30 बजे से 12:16 बजे तक
​रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:16 बजे से 01:03 बजे तक
​अपराह्न काल: दोपहर 01:03 बजे से 03:23 बजे तक
​पूजन विधि और धार्मिक उपाय

पितरों की शांति और प्रसन्नता के लिए इस दिन विशेष धार्मिक कार्य किए जाते हैं:
​आहुति व प्रणाम: अमावस्या के दिन दोपहर में उपले (गोबर के कंडे) जलाकर उस पर खीर की आहुति दें। तत्पश्चात जल के छींटे देकर हाथ जोड़कर पितरों को नमन करें।
​पंचबली भोग: गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों को भोजन (ग्रास) अवश्य निकालें। इससे पितृ तृप्त होते हैं।

​पाठ एवं जप: श्रीमद्भगवद्गीता, हरिवंश पुराण का पाठ और पितृ गायत्री मंत्र का जप करने से पितृ दोष शांत होता है।
​तीर्थ श्राद्ध का महत्व
यद्यपि प्रत्येक माह की अमावस्या पितरों की पुण्यतिथि मानी जाती है, लेकिन हरिद्वार, गया, पुष्कर, प्रयागराज, नर्मदा तट, गोदावरी, गंगातट, उज्जैन, जगन्नाथ पुरी, काशी और त्र्यंबकेश्वर जैसे पवित्र स्थलों पर किया गया श्राद्ध ‘तीर्थ श्राद्ध’ कहलाता है, जिसका अक्षय फल प्राप्त होता है।

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