लखनऊ। ब्लैडर कैंसर (मूत्राशय के कैंसर) के गंभीर मरीजों के लिए एक राहत भरी खबर सामने आई है। लोहिया संस्थान के यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. ईश्वर राम धायल ने एक ऐसी शल्य चिकित्सा (सर्जरी) तकनीक पर 15 वर्षों के अध्ययन का सफल अनुभव साझा किया है, जो खासतौर पर बुजुर्गों, कमजोर और कम किडनी कार्यक्षमता (Renal function) वाले मरीजों के लिए बेहद कारगर साबित हो रही है।
क्या है यह तकनीक?
सामान्यतः ब्लैडर कैंसर में रेडिकल सिस्टेक्टॉमी (मूत्राशय हटाने) के बाद मूत्र मार्ग बनाने के लिए मरीज की आंत के हिस्से का उपयोग किया जाता है। हालांकि, ‘क्यूटेनियस यूरेटेरोस्टॉमी’ तकनीक में बिना आंत का इस्तेमाल किए मूत्र को शरीर से बाहर निकालने का नया रास्ता बनाया जाता है।
तकनीक के प्रमुख लाभ:
कम जटिलता: आंत का उपयोग न होने से सर्जरी का समय और जटिलताएं काफी कम हो जाती हैं।
त्वरित रिकवरी: ऑपरेशन के दौरान रक्तस्राव कम होता है और मरीज को अस्पताल में कम दिन रहना पड़ता है।
सुरक्षित विकल्प: यह विधि उन मरीजों के लिए जीवनरक्षक है जो अपनी शारीरिक स्थिति या किडनी की कमजोरी के कारण बड़ी सर्जरी का जोखिम नहीं उठा सकते।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर चमकेगा भारतीय अध्ययन
डॉ. ईश्वर राम धायल के इस 15 साल लंबे अध्ययन में 400 से अधिक मरीजों का विश्लेषण किया गया है। उनके इस शोध का चयन ‘इंटरनेशनल ब्लैडर कैंसर नेटवर्क (IBCN) की वार्षिक बैठक-2026’ के लिए हुआ है।
यह प्रतिष्ठित सम्मेलन 24 से 26 सितंबर तक टोरंटो विश्वविद्यालय (कनाडा) में आयोजित होगा, जहां दुनिया भर के 150 से 200 ब्लैडर कैंसर विशेषज्ञ जुटेंगे। डॉ. ईश्वर वहां सर्जरी के परिणाम, किडनी की कार्यक्षमता, संक्रमण दर और स्टोमा संबंधी पहलुओं पर अपना विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करेंगे।
विशेषज्ञ की राय: “ब्लैडर कैंसर के हर मरीज के लिए एक ही तरह का मूत्र मार्ग परिवर्तन उपयुक्त नहीं होता। मरीज की उम्र, शारीरिक क्षमता और किडनी की स्थिति को ध्यान में रखकर ही सही विकल्प चुनना चाहिए।”
— डॉ. ईश्वर राम धायल, विभागाध्यक्ष (यूरोलॉजी), लोहिया संस्थान










