प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में नर्सिंग स्टाफ का भारी टोटा
एक नर्स के भरोसे 40 मरीज
लखनऊ। प्रदेश के सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में मरीजों की भारी भीड़ के बीच स्वास्थ्य व्यवस्था वेंटिलेटर पर नजर आ रही है। अस्पतालों में नर्सिंग स्टाफ की कमी अब एक गंभीर संकट बन चुकी है। हालात इस कदर बदतर हैं कि जहाँ इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड (IPHS) के नियमों के मुताबिक 6 बेड पर एक नर्स होनी चाहिए, वहीं मौजूदा समय में एक नर्स को अकेले 40-40 बेड संभालने पड़ रहे हैं।
सोमवार को बलरामपुर अस्पताल स्थित राजकीय नर्सेस संघ के कार्यालय में आयोजित एक पत्रकार वार्ता के दौरान संघ के पदाधिकारियों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए जल्द मांगें न पूरी होने पर बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है।
राजकीय नर्सेस संघ के महामंत्री अशोक कुमार ने आंकड़ों के जरिए स्वास्थ्य विभाग की बदहाली को उजागर किया:
कुल बेड की संख्या: प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में करीब 77,000 बेड हैं।
मानक के अनुसार जरूरत: शिफ्ट ड्यूटी, लीव और रिजर्व स्टाफ मिलाकर करीब 45,000 नर्सों की आवश्यकता है।
मौजूदा तैनाती: वर्तमान में सिर्फ 17,000 नर्सें ही कार्यरत हैं। इनमें भी केवल 3,500 नियमित हैं, जबकि 14,500 संविदा और NHM के भरोसे हैं।
नर्सिंग अधिकारियों का संकट: स्वीकृत 11,000 पदों में से लगभग 6,000 पद खाली पड़े हैं।
डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक के आश्वासनों के बावजूद वर्ष 2010 से तीनों नर्सिंग अधीक्षक और मुख्य नर्सिंग अधिकारी (CNO) के पद खाली हैं।
साल 2021-22 में महज 400 नियमित नर्सों की भर्ती हुई थी,
🩺 मेडिकल कॉलेजों का भी बुरा हाल: 3200 से ज्यादा पद खाली
चिकित्सा शिक्षा नर्सेस संघ की अध्यक्ष वीना त्रिपाठी ने बताया कि सिर्फ सामान्य अस्पताल ही नहीं, बल्कि प्रदेश के बड़े मेडिकल कॉलेज भी स्टाफ की कमी से जूझ रहे हैं।
कुल स्वीकृत पद (CNO से लेकर नर्सिंग ऑफिसर तक): 8,113
भरे हुए पद: 4,856
खाली पड़े पद: 3,257
स्टाफ की कमी के कारण ड्यूटी पर मौजूद नर्सों पर काम का अत्यधिक दबाव है। एक ही नर्स को सभी जिम्मेदारियां संभालनी पड़ रही हैं।
तीमारदारों (मरीजों के परिजनों) के सवालों के जवाब देना।
नतीजा: भीड़भाड़ वाले वार्डों में काम में थोड़ी भी देरी होने पर तीमारदारों और नर्सिंग स्टाफ के बीच आए दिन तीखी झड़प और विवाद की स्थिति बन रही है।
📌 राजकीय नर्सेस संघ की प्रमुख मांगें
नर्सिंग संघ ने साफ कर दिया है कि यदि उनकी निम्नलिखित मांगों पर जल्द फैसला नहीं लिया गया, तो वे काम बंद कर सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे:
होम डिस्ट्रिक्ट पोस्टिंग: नर्सों को उनके गृह जनपद में तैनाती दी जाए।
भत्तों में समानता: KGMU, PGI और लोहिया संस्थान की तर्ज पर सरकारी अस्पताल की नर्सों को भी समान भत्ते मिलें।
पदों को भरना: सभी खाली पड़े पदों को तत्काल भरा जाए और उच्च पदों को पदोन्नति (Promotion) के जरिए भरा जाए।
पुनर्गठन: नर्सिंग संवर्ग के पदों का मानक (IPHS) के अनुसार दोबारा पुर्नगठन किया जाए।
पुरानी पेंशन व निजीकरण: पुरानी पेंशन योजना (OPS) बहाल की जाए और स्वास्थ्य सेवाओं में निजीकरण को पूरी तरह खत्म किया जाए।












