अब व्हाइट फंगस संक्रमण का डर

0
620

 

 

लखनऊ। ब्लैक फंगस यानी म्यूकरमाइकोसिस के केस लगातार बढ़ रहे हैं। इससे मरीजों की मौत की संख्या भी बढ़ रही है। इस बीच बिहार की राजधानी पटना में व्हाइट फंगस के 4 केस मिले हैं। अब व्हाइट फंगस मिलने से लोगों को इसके संक्रमण का डर सताने लगा है, हालांकि विशेषज्ञ डॉक्टरों का कहना है कि इसकी जल्द पहचान कर इसका इलाज किया जा सकता है। वर्तमान में कोरोना संक्रमण से ठीक होने वाले मरीजों और ऑक्सीजन पर लंबे समय से रहने वाले मरीजों में व्हाइट फंगस मिला है।
विशेषज्ञों का दावा है कि यह ब्लैक फंगस से भी ज्यादा घातक हो सकता है। कोरोना संक्रमण काल में यह फेफड़ों के संक्रमण का मुख्य कारण बन सकता है। यह फंगस इंसान के त्वचा, नाखून, मुंह के अंदरूनी हिस्से, आमाशय, आंत, किडनी, गुप्तांग और दिमाग पर भी बेहद असर डालता है। बताते चलें पटना मेडिकल कॉलेज में अब तक व्हाइट फंगस के 4 मरीज मिल चुके हैं। इन चारों मरीजों में कोरोना जैसे लक्षण थे। इन मरीजों कोरोना के तीनों टेस्ट रैपिड एंटीजन, रैपिड एंटीबॉडी और आरटी-पीसीआर कराये जाने चाहिए, जिसमें व्हाइट फंगस को एंटी फंगल दवाएं देने के बाद मरीज ठीक हो जाते है। जब मरीज का सीटी स्कैन किया जाता है तो फेफड़ों में संक्रमण के लक्षण कोरोना जैसे ही नजर आते हैं। ऐसे में अंतर करना बेहद मुश्किल हो जाता है। ऐसे मरीजों का रैपिड एंटीजन और आरटी-पीसीआर टेस्ट निगेटिव आता है। विशेषज्ञों की माने तो अगर सीटी स्कैन में कोरोना जैसे लक्षण दिख रहे हैं । इसके लिए बलगम का कल्चर कराने से व्हाइट फंगस की पहचान की जा सकती है।
बताते चले कि व्हाइट फंगस की चपेट में वे कोरोना मरीज आ सकते है, जो ऑक्सीजन सपोर्ट पर हैं। व्हाइट फंगस उनके फेफड़ों को संक्रमित कर सकता है। डॉक्टरों की मानें तो व्हाइट फंगस होने की वजह भी इम्यूनिटी की कमी होना है। केजीएमयू की माइक्रोबायोलॉजी विभाग की वरिष्ठ डॉक्टर शीतल वर्मा का कहना है कि व्हाइट फंगस को आमतौर पर कैनिडा फंगस भी कहां जाता है। इसका कई प्रकार का वर्गीकरण किया जा सकता है। यह फंगस डायबिटीज कंट्रोल ना होना, एंटीबायोटिक का अधिक सेवन या काफी समय तक स्टेरॉयड लेने से यह फंगस मरीजों को अपनी चपेट में ले सकता है। उन्होंने बताया यह फंगस नवजात में यह बीमारी डायपर कैंडिडोसिस के रूप में होती है, जिसमें क्रीम कलर के सफेद धब्बे दिखते हैं। छोटे बच्चों में यह ओरल थ्रस्ट करता है। महिलाओं में यह ल्यूकोरिया का मुख्य कारण है।
व्हाइट फंगस से बेहद आसानी से बचा जा सकता है। ऑक्सीजन या वेंटिलेटर पर मौजूद मरीजों के उपकरण विशेषकर ट्यूब आदि जीवाणु मुक्त होने चाहिए। ऑक्सीजन सिलेंडर ह्यूमिडिफायर के लिए स्ट्रेलाइज वॉटर का इस्तेमाल करना चाहिए। इस फंगस से मरीजों को बचाने के लिए सुनिश्चित करना होगा कि बीमार व्यक्ति जो ऑक्सीजन ले रहा है, वह विषाणुमुक्त हो।

Previous article…..अभी सिर्फ यही मिलेगा एंफोटेरेसिन-बी इंजेक्शन
Next articleम्यूकरमाइकोसिस यानी ब्लैक फंगस के मरीज लगातार बढ़ रहे

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here