प्लाज्मा थैरेपी ”मैजिक बुलेट” नहीं

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न्यूज। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद(आईसीएमआर) ने कहा है कि प्लाज्मा थैरेपी” सिल्वर बुलेट”” टेस्ट नहीं है और ठोस वैज्ञानिक शोधों के बिना इसके इस्तेमाल की सिफारिश करना मरीजों को फायदा पहुंचाने के बजाय नुकसान हो सकता है। आईसीएमआर के महानिदेशक डा़ बलराम भार्गव के एक अंग्रेजी दैनिक में प्रकाशित लेख में स्पष्ट किया गया है कि आईसीएमआर अभी इस पर शोध कार्य कर रहा है और यह ” ओपन लेबल, रेंडमाइज्ड, कंट्रोल्ड ट्रायल “” है जो इस थैरेपी की सुरक्षा तथा प्रभाविता के लिए किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि इस थैरेपी से कुछ मरीजों में बुखार, खुजली, फेंफड़ों को नुकसान और गंभीर जानलेवा दुष्परिणाम हो सकते हैं। अभी तक केवल 19 मरीजों पर प्लाज्मा थैरेपी के तीन लेख प्रकाशित हुए हैं और इतने कम मरीजों की संख्या के आधार पर यह सिफारिश नहीं की जा सकती है । यह कहना भी सही नहीं होगा कि यह थैरेपी सभी मरीजों के लिए समान रूप से कारगर साबित होगी। दरअसल महाराष्ट्र में एक मरीज की प्लाज्मा थैरेपी के दौरान मौत हो जाने से इसकी सटीकता को लेकर सवालिया निशान खड़े हो गए है और स्वास्थ्य मंाालय ने भी इसके बारे में स्पष्ट कर दिया है कि प्लाज्मा थेरेपी को विश्व में कहीं भी मान्य उपचार के तौर पर पुष्टि नहीं हुई है और यह सिर्फ ट्रायल के तौर पर ही की जा रही है तथा दिशा-निर्देशों का पालन किए बिना यह घातक साबित हो सकती है।

मंाालय ने स्पष्ट किया है कि देश में कई स्थानों पर प्लाज्मा थेरेपी का इस्तेमाल कोरोना मरीजों के इलाज के लिए हो रहा है लेकिन इसका उपयोग भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के दिशा- निर्देशों के तहत ही होना चाहिए और इसके लिए ” ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया” से मंजूरी लेनी जरूरी है। इसी के बाद ही यह प्रकिया शुरू की जानी है।

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