दो साल से कम अंतर पर जन्मे 10 बच्चे नहीं मना पाते पहला जन्मदिन

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लखनऊ। मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए यह बहुत ही जरूरी है कि दो बच्चों के जन्म में कम से कम तीन साल का अंतर रखा जाये। ऐसा न करने से गर्भावस्था के दौरान परेशानी हो सकती है। वहीं बच्चों के भी कुपोषित होने की पूरी संभावना रहती है। शोध में देखा गया है कि बच्चों के जन्म में तीन साल से कम अंतर रखने वाली करीब 62 फीसद महिलाएं एनीमिया की गिरफ्त में आ जाती हैं। इसी प्रकार दो साल से कम अंतराल पर जन्मे बच्चों में शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) 91 प्रति हजार जीवित जन्म है, जो कि समग्र आईएमआर 64 प्रति हजार जीवित जन्म से कहीं अधिक है। यह बात परिवार कल्याण निदेशक डॉ. बद्री विशाल ने वृहस्पतिवार को यहाँ एक स्थानीय होटल में सेंटर फॉर एडवोकेसी एंड रिसर्च (सीफॉर) के सहयोग से युवा दम्पतियों में बच्चों के बीच अंतर और गर्भधारण में देरी के महत्व की अवधरणा को मजबूत करने के लिए आयोजित मीडिया कार्यशाला में कही।

कार्यशाला में संयुक्त निदेशक- परिवार कल्याण डॉ. वीरेंद्र सिंह ने कहा कि प्रदेश की कुल किशोर जनसंख्या करीब 4.89 करोड़ है । एनएफएचएस-4 (2015-16) के आंकड़े बताते हैं कि सर्वेक्षण के दौरान करीब 3.8 फीसद किशोरियाँ 15 से 19 साल की उम्र में गर्भवती हो चुकी थीं या माँ बन चुकी थीं। इस वर्ग की किशोरियों को असुरक्षित गर्भपात और किशोरावस्था में गर्भ धारण को टालने के लिए अंतराल विधियों के बारे में जागरूक करना और उपलब्धता सुनिश्चित कराने पर पूरा ज़ोर दिया जा रहा है। अस्थायी गर्भनिरोधक की आवश्यकता को पूरा करने से लड़कियों के स्कूल छोड़ने, महिलाओं के कार्यस्थल छोड़ने जैसी समस्याओं पर काबू पाया जा सकेगा।

उन्होंने कहा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-4 (एनएफएचएस-4) के आंकड़ों के अनुसार करीब 57 फीसद महिलाओं और उतने ही पुरुषों का मानना है कि एक आदर्श परिवार में दो या उससे कम बच्चे होने चाहिए। देश के सात राज्यों के 145 जिले उच्च प्रजनन की श्रेणी में चिन्हित किए गए हैं। इन सात राज्यों में उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और असम शामिल हैं और इन 145 उच्च प्रजनन वाले जिलों में 57 उत्तर प्रदेश के हैं, जिनकी कुल प्रजनन दर तीन या तीन से अधिक है । वरिष्ठ परिवार नियोजन विशेषज्ञ, सिफ़्सा डा. अरुणा नारायण ने कहा- परिवार के साथ-साथ सभी विभागों की जिम्मेदारी बनती है कि महिला अपनी देखभाल करने को लेकर जागरूक हो ताकि वह स्वयं के लिए निर्णय ले सके। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, परिवार नियोजन की महाप्रबंधक, डॉ. अल्पना ने परिवार नियोजन के साधनों के बारे में विस्तार से बताते हुये कहा- परिवार नियोजन के लिए मौजूद आधुनिक साधनों में ज़्यादातर लोगों को अस्थाई साधन पसंद आ रहे हैं।

इस अवसर पर किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय की प्रो. और सेंटर ऑफ एक्सिलेन्स की समन्वयक डॉ. सुजाता देव ने बताया कि किशोर, किशोरियों को स्वयं जागरूक होना जरूरी है कि उनके शरीर में क्या परिवर्तन हो रहे हैं, उनके लिए क्या आवश्यक है और क्या नहीं । विवाह से पहले लड़का हो या लड़की उन्हें विवाह पूर्व परामर्श दिया जाना चाहिए।
कार्यशाला में प्रदेश तकनीकि सहायक इकाई (यूपीटीएसयू), ग्लोबल हेल्थ स्ट्रेटीज़ (जीएचएस), ममता हेल्थ इंस्टीट्यूट ऑफ मदर एंड चाइल्ड, पोपुलेशन सर्विस इंटेरनेशनल (पीएसआई) व पोपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएफआई) व पाथ के प्रतिनिधियों ने भी प्रतिभाग किया।

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