लखनऊ। रिजिड ब्राांकोस्कोपी के जरिये सांस की नली में गांठ और फेफड़े का कैंसर के मरीजों का इलाज आसान हो गया है। ब्राांकोस्कोपी के जरिये गांठ निकालकर मरीज को इलाज के जरिये बचाना मुमकिन हो गया है। शनिवार को वार्षिक
अधिवेशन में पीजीआई के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के प्रमुख डा. आलोक नाथ और कार्यक्रम के संयोजक डॉ. अजमल खान ने दी। अधिवेशन का उदघाटन एम्स दिल्ली के निदेशक डॉ. रनदीप गुलेरिया ने किया।
डॉ. गुलेरिया ने कहा कि चिकित्सा क्षेत्र में आधुनिक तकनीक की वजह से ही इलाज आसान हुआ है। आधुनिक तकनीक के प्रति अपडेट रहने से मरीज का उच्चस्तरीय इलाज करना आसान हो जाता है। डॉ. एसके जिंदल, डॉ. मानसी गुप्ता समेत विशेषज्ञों ने बताया कि अब ब्राांकोस्कोपी और थोरोस्कोपी के जरिए फेफड़े के कैंसर, टीबी सहित दूसरी बीमारियों का पता शुरूआती दौर में लगना संभव हुआ है, जिससे इलाज की सफलता दर में पहले मुकाबले काफी बढ़ी है। अधिवेशन में इस तकनीकि के बारे में जूनियर डाक्टरों को बताया गया। डॉ पल्मोनरी विभाग के डॉ. अजमल खान बताते हैं कि फेफड़े से जुड़ी बीमारियों का इलाज लेजर तकनीक से आसान हो गया है, जिसमें सांस की नली में रूकावट पैदा करने वाले ट्यूमर को लेजर से जला देते हैं।
अधिक लंबे समय तक सांस की नली में ट्यूब पड़े रहने से वहां छोटी गांठ (स्टोनोसिस) हो जाती है। जिससे ट्यूब निकालने के बाद सांस लेने में दिक्कत होती है। लेजर से गांठ को जलाकर वहां पर दोबारा सिकुडन न हो इसके लिए स्टंट लगाया जाता है। पल्मोनरी विभाग के डॉ. जिया हाशिम बताते हैं कि इसमें प्रोब (एक उपकरण) जिसे मुंह के रास्ते मरीज के सांस की नली से फेफड़े तक पहुंचे हैं। उपकरण के आगे के हिस्से का तापमान सामान्य से 70 डिग्री सेल्सियस कम होता है। इसमें ऊतक का करीब पांच मिमी का टुकड़ा चिपक जाता है। इस टुकड़े को बाहर निकाल लिया जाता है। इस बायोप्सी से बीमारी का पता लगाया जाता है। अभी तक इसी नमूने को एकत्र करने के लिए चीरा लगाना पड़ता था।
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