लखनऊ. सरकारी अस्पतालों में लगभग 3 महीने से दवा आपूर्ती बंद है. फिर भी स्वास्थ विभाग के आला अधिकारियों को यह कमी नजर नहीं आ रही है. दवाओं की कमी का आलम यह है कि मरीजों को एक एंटीबायोटिक इंजेक्शन से तीन लोगों का इलाज किया जा रहा है . दावा है कि है कि दवाओं की कमी लोकल परचेस से पूरा किया जा रहा है . परंतु क्यों दावे खोखले साबित होते हैं . यूपी के अस्पतालों में आम मरीजों के लिये दवायें नहीं हैं. आडिट के नाम पर सरकार के तीन माह से दवाओं की खरीद पर रोक लगा रखी हैं.
शायद यह सरकार की नई व्यवस्था लाई है कि दवा की कमी बता कर एक इंजेक्शन से तीन मरीजों का इलाज हो जाये. खरीद फरोख्त में भ्रष्टाचार रोकने व पारदर्शी व्यवस्था के नाम पर एक साल पूर्व 2 करोड़ की लागत से बना पोर्टल डीवीडीएमआरएस बंद कर, सेंट्रल पर्चेज के नाम पर गठित ड्रग कार्पोरेशन को बीते 10 जून को हस्तांतरित कर निष्क्रिय बना दिया. स्वास्थ्य विभाग के पास वर्तमान में आवश्यक दवा व उपकरणों के लिये कोई इंतजाम नहीं है, बीते तीन माह से प्रदेश के अस्पतालों दवायें व इलाज की जरूरत की दूसरी चीजों की आपूर्ति बंद है.
हालत यह हैं सरकार के दबाव चलते अस्पतालों में डाक्टर व कर्मचारी एक एंटीबायोटिक इंजेक्शन से तीन से चार मरीजों को दवा देने को मजबूर हैं. मरीजों कीआर्थे जैसी बड़ी सर्जरी के लिये डाक्टर दस बार सोच रहे हैं कि आखिर आपरेशन के बाद मरीज को संक्रमण से बचाने के लिये एंटीबायोटिक कहां से लायेंगे. बहराल, वीआईपी और वीवीआईपी मरीजों पर इसका असर नहीं है, अस्पताल के अफसरों ने ऐसे मरीजों के लिये अलग से गुप्त इंतजाम कर रखा है.
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