इनकार कहीं परेशानी का सबब ना बने

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लखनऊ. किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय प्रशासन को ट्रामा सेंटर में आग की घटना के दौरान मरीजों को समय पर सही इलाज न मिलने से बढ़ रही मौत का इनकार कहीं परेशानी का सबब न बन जाए। शासन के अधिकारियों का भी मानना है कि आग की घटना के दौरान भर्ती बचाने के लिए डाक्टरों, पैरामेडिकल व कर्मचारियों ने बेहतर तालमेल बैठाते हुए काम किया, इसमें कुछ गंभीर मरीजों की मौत के मामले शिफ्टिंग के दौरान भी आ रहे है, लेकिन केजीएमयू प्रशासन तो एक सिरे मौत को ही इनकार कर रहा है।

शनिवार को केजीएमयू के ट्रामा सेंटर में लगी आग के कारण मरीजों को तीन से चार फ्लोर तक खाली कराकर शिफ्ट करना पड़ा था। इस शिफ्टिंग में मरीजों को अपने मरीजो को लेकर खुद बाहर आना पड़ा था। आलम यह था कि मरीज बिस्तर सहित बाहर आ गये आैर काफी संख्या में स्ट्रेचर में बाहर भाग कर आये। इसके बाद मरीजों को शताब्दी अस्पताल, लॉरी व मेडिसिन विभाग में शिफ्ट किया गया। इस भगदड़ में काफी संख्या में गंभीर मरीज काफी संख्या में जिनकी सांसे आक्सीजन पर ही टिकी थी। इनमें नियोनेटल केयर यूनिट में भर्ती शिशु भी शामिल थे, इनको शिफ्ट करना पड़ा था। इस दौरान दो शिशु की मौत भी हुई। इनमें काफी को स्वास्थ्य विभाग ने सरकारी अस्पतालों में रेफर करा दिया। इसके अलावा घटनाओं को देखा जाए तो मरीज संतोष के परिजन उसे बिस्तर सहित लेकर नीचे आये थे।

उनका आरोप था कि उसके आक्सीजन लगी हुई थी नीचे लेकर आने के बाद उसकी सांसे उखड़ने लगी थी। लेकिन उसे शताब्दी अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया, जहां पर डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था। इसके अलावा आज भी बरेली से अपनी पत्नी का डेथ सर्टिफिकेट लेने आये परिजनों का भी यही कहना था। नीचे लाते वक्त आक्सीजन हटाने के कारण मौत हो गयी। उधर केजीएमयू के कुलपति प्रो. एमएलबी भट् का दावा है कि किसी मरीज की मौत आग की घटना के कारण इलाज में लापरवाही के कारण नही हुई, उन्होंने सभी मरीजों के इलाज की वैकल्पिक व्यवस्था चाक चौबंद कर रखी थी। जो मरीज मरे वह पहले मर गये थे आैर उनकी हालत गंभीर थी।

उधर शासन के अधिकारियों का मत है कि हालांकि केजीएमयू में आग की घटना के बाद भर्ती मरीजों को बेहतर इलाज दिया भी गया, लेकिन गंभीर मरीजों की मौत शिफ्टिंग के वक्त हो जाती है जो कि आक्सीजन पर टिके ंहुए हो। ऐसे कुछ मरीजों के परिजनों ने ही दावा किया है। बताया जाता है कि केजीएमयू प्रशासन के इनकार से जांच भी हो सकती है कि मरीजो की मौत आखिर कब आैर कैसे हुई।

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