लखनऊ। किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय परिसर में चलने वाली एम्बुलेंस में मरीजों के निकाले गये वीगों आैर पट्टी से टूटा बम्पर बांधा जाता है, तो ड्रेसिंग में प्रयोग होने वाले टेप से फटी गद्दी चिपकायी जाती है। एम्बुलेंस की हालत इतनी खस्ता है कि वार्ड तक पहुंचने में मरीज तो किसी तरह बचता है लेकिन तीमारदार अक्सर चोटिल हो जाता है आैर उसे टिगबैग का इंजेक्शन लगाना पड़ता है।
परिसर में ट्रामा सेंटर से मरीजों को वार्डो में भेजने के लिए कुल नौ एम्बुलेंस चलती है। इनमें तीन एम्बुलेंस खराब चल रही है। बजट के अभाव में इनको बनवाया नहीं जा रहा है। छह चलने वाली एम्बुलेंस की हालत इतनी खस्ता है कि मरीज वार्ड तक पहुंचने बेहाल हो जाता है आैर तीमारदार डरते है कि उन्हें अंदर बैठे- बैठे चोट न लग जाए। चलने वाली एम्बुलेंस बेहद जर्जर हालत में है। एम्बुलेंस के अंदर की सीट फटनी है। उनके अंदर का फॉम निकल गया है। रैक्सीन को जोड़ने के लिए ड्रेसिंंग में प्रयोग होने वाला टेप का प्रयोग किया जाता है। एम्बुलेंस के फ्लोर की मैट गायब हो चुकी है। कई जगहों पर सीट की लोहे की पत्ती निकली हुई है।
अक्सर तीमारदारों को उससे चोट लग जाती है, जिससे तीमारदार को टिगबैग का इंजेक्शन लगाना पड़ता है। यहां तक टूटे बम्पर को बांधने के लिए मरीज के निकाले गये वीगों व पट्टी का प्रयोग किया जाता है। अक्सर एम्बुलेंस चलते-चलते बंद हो जाती है। बताया जाता है कि एम्बुलेंस का बजट बहुत कम दिया जाता है। एम्बुलेंस प्रभारी डा. संतोष कुमार का कहना है कि एम्बुलेंस की मरम्मत के लिए बजट की मांग की गयी है। नौ में छह एम्बुलेंस ही चल रही है। कई एम्बुलेंस को ठीक करने की प्रक्रिया चल रही है।