लखनऊ। सूबे की लडख़ड़ा रही चिकित्सा व्यवस्था के सुधार के लिए एक ओर जहां सरकार प्रयासरत है। वहीं दूसरी ओर जनहित के लिए बनाई गई नीतियों का आशा के अनुरूप जनता को लाभ नहीं मिल पा रहा है। ग्रामीण अंचलों में चिकित्सा सुविधाएं कितनी बेहतर हैं,यह किसी से छुपा नहीं है। यदपि ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में तेजी से अस्पताल खोल कर लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देने का प्रयास किया जा रहा है। बावजूद इसके चिकित्सा व्यवस्था पटरी पर नहीं आ रही है। इसकी बानगी सूबे की राजधानी के सरकारी अस्पतालों में देखने को मिल रही है। यह चिराग तले अंधेरे को चरितार्थ कर रही है।
बात लखनऊ स्थित सिविल अस्पताल की करें तो यह देखने को मिल रहा है। अस्पताल प्रशासन के ढुलमुल रवैये के कारण चिकित्सालय की प्रतिष्ठïा धूमिल हो रही है। अस्पताल कर्मचारियों की बढती अनुशासनहीनता मरीजों पर भारी पड़ रही है।
नियमों के आंड़ में कर्मचारी किस तरह टराक देते हैं,इसकी बानगी बीते शनिवार को घटित एक घटना से मिल जाती है। विकास नगर निवासी आरती पिछले काफी समय से हड्डी रोग से पीडि़त चल रही हैं। जिनका इलाज सिविल अस्पताल के वरिष्ठï चिकित्सक डा.नरेन्द्र दत्त की देखरेख में चल रहा है। इसी सिलसिल में आरती शनिवार को इलाज कराने अस्पताल पहुंची थी। चिकित्सक ने रोगी को एक्स-रे कराने की सलाह दी।
मरीज जब एक्स-रे कराने के लिए पहुंची तो वहां पर तैनात टेक् नीशियन ने बगल वाले कमरें में जाने के लिए कहा। इस पर मरीज जब दूसरे कमरे में पहुंची तो वहां पर मौजूद व्यक्ति ने डिजिटल एक्स-रे की बात कह दोबारा से पहले वाले कमरे में भेज दिया। डिजीटल एक्स-रे में तैनात टेक् नीशियन मरीज की बात सुनने को तैयार नहीं था। इस तरह एक्स-रे कराने के लिए महिला मरीज को एक घंटे तक एक्स-रे कराने के लिए जद् दोजहद करनी पड़ी। इस संबंध में डिजीटल एक्स-रे टेक् नीशियन से एक्स-रे न करने का कारण जानने का प्रयास किया तो वह नोटिस बोर्ड की तरफ इशार करते हुए कमरे से ही बाहर चला गया। जब मरीज ने इस बात की शिकायत अस्पताल के निदेशक से की तब जाकर सामान्य एक्स-रे हो सका।
टेक्नीशियन द्वारा एक्स-रे के लिए मना करना एक गंभीर मामला है। चिकित्सक द्वारा लिखे जाने के बावजूद यदि जांच नहीं हुयी है,तो उसकी जांच करा कर दोषी पर कार्रवाई की जायेगी।
-डा. हिम्मत सिंह दानू,निदेशक,सिविल अस्पताल