भारत में आज भी बहुत से इलाकों में गर्भवती महिलाओं का प्रसव अप्रशिक्षित दाई करा रही हैं। जो महिलाओं के साथ उनके होने वाले बच्चे के लिए घातक साबित हो सकते हैं। इतना ही नहीं अप्रशिक्षित दाई द्वारा प्रसव कराना बच्चे को मिर्गी। ऐपिलिप्सी का मरीज भी बना सकता है। जिससे उस नवजात का पूरा जीवन प्रभावित हो जाता है। इसलिए प्रसव हमेशा स्त्री रोग विशेषज्ञ की देखरेख में होना जच्चा व बच्चा दोनों के सेंहतमंद जीवन के लिए बहुत ही जरूरी है। यह कहना है केजीएमयू के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रो.राजेश वर्मा का। उन्होंने बताया कि अप्रशिक्षित दाई द्वारा प्रसव कराने के दौरान कई बार नवजात के दिमाग तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाता है।
जिससे उस बच्चे के दिमाग का वह हिस्सा, जहां ऑक्सीजन नहीं पहुंची,वह क्षतिग्रस्त हो जाता है। जिसकी वजह से आगे चलकर बच्चे को मिर्गी का दौरा पड़ता है। प्रो.राजेश वर्मा के मुताबिक मिर्गी का रोग एक सामान्य बीमारी है। पूरे विश्व की एक प्रतिशत आबादी इस बीमारी की चपेट में है। बदलती जीवनशैली के कारण यह रोग तेजी से फैल रहा है। इस बीमारी में बार-बार दौरे आते हैं । यह एक तरह का न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है, जिसमें मरीज के दिमाग के तन्तु एक साथ ऐक्टिव हो जाती हैं। १ दिन के बच्चे से लेकर सौ साल के बुजुर्ग तक को मिर्गी हो सकती है।
मिर्गी के दौरे
प्रो.राजेश ने बताया कि मिर्गी के दौरो दो प्रकार के होते हैं। एक दौरा शरीर के एक हिस्से में होता है,जबकि दूसरे प्रकार का दौरा पूरे शरीर में एक साथ आता है। दौरे के समय मुंह से झाग आता है। बदन नीला पड़ जाता है। उन्होंने बताया कि दौरे की अवधि ३ से ५ मिनट की होती है। उसके बाद ९० से ९५ प्रतिशत मरीज स्वत: ही ठीक हो जाता है। यदि १० मिनट से ज्यादा दौरा आये तो मरीज को विशेषज्ञ के पास ले जाना चाहिए। ५ प्रतिशत मरीजों को तत्काल इलाज की जरूरत होती ैैहै।
अनुवांशिक हो सकती है बीमारी
प्रो.राजेश वर्मा की माने तो कुछ मामलों में मिर्गी की बीमारी अनुवांशिक होती है। लेकिन उसका भी इलाज संभव है। उन्होंने बताया कि कई बार लड़कियों की शादी दौरा पडऩे की वजह से नहीं हो पाती है। यदि हो भी जाये तो पारिवारिक जीवन में तनाव आ जाता है। ऐसे मामलों में घबराने की जरूरत नहीं है। बल्कि इलाज की आवश्यकता होती है।
मिर्गी के दूसरे कारण
प्रो.राजेश ने बताया कि मिर्गी के अन्य कारण हो सकते हैं। २ से ५ वर्ष तक के बच्चों में बुखार प्रमुख कारण होता है। जिसमें बच्चों को दौरे पड़ते हैं। ८० से ९० प्रतिशत मामलों में बुखार ठीक हो जाने पर दौरे भी ठीक हो जाते हैं। १०० में से ६ बच्चों में इस तरह की समस्या देखी गयी है। इसके अलावा फीता कृमि का अंडा,टीबी की गांठ,जपानी इंसेफ्लाइटिस,बे्रन ट्यूमर तथा ५० साल की उम्र के बाद पक्षघात का होना प्रमुख कारणों में शामिल है।
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