लखनऊ। लगभग 50 से 60 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में ब्लड की कमी यानी एनीमिया बीमारी जांच के दौरान पायी जाती है। ब्लड की कमी प्रसव के दौरान कई जटिल दिक्कतें हो सकती हैं। यह जानकारी यूपीकॉन 2023 की आयोजक सचिव डॉ. प्रीति कुमार ने शनिवार को केजीएमयू के अटल बिहारी वाजपेई साइंटिफिक कन्वेंशन सेंटर में यूपीकॉन 2023 के दूसरे दिन दी।
यूपीकॉन का आयोजन लखनऊ अब्सट्रेक्टस एंड गायनकोलॉजिस्ट सोसाइटी (एलओजीएस) और गायनी एकेडिमक वेलफेयर एसोसिशन द्वारा आयोजित किया जा रहा है। डॉ. कुमार ने कहा कि गर्भवती महिलाएं शुरू से सिजेरियन विधि से प्रसव कराने के लिए कहती हैं, जब कि बहुत से महिलाओं में सामान्य प्रसव की पूरी संभावनाएं होती हैं। फिर भी वे दबाव डालती हैं। ऐसी गर्भवती महिलाएं व उनके परिवारीजनों की काउंसिलिंग करनी पड़ती है। उन्होंने बताया कि सिजेरियन कराने के बाद प्रसव के बाद महिलाओं के कम से कम सात दिन अस्पताल में गुजारने पड़ते हैं। संक्रमण की संभावना रहती है, जबकि सामान्य प्रसव में महिला की छुट्टी दो से तीन दिन में हो जाती है।
वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ.रमा श्रीवास्तव ने बताया कि कास्मेटिक गायनोकालॉजी का दो तीन वर्षो में चलन बढ़ा है। इसमें महिलाओं के जन्नेद्रिंय सर्जरी से ठीक की जा रही है। फेजाइना व लेबिया प्लास्टी की जा रही है। पहले यहां पर प्लास्टिक सर्जन करते रहें हैं, अब स्त्री रोग विशेषज्ञ कर रहीं हैं। उन्होंने बताया कि शरीर के किसी अंग को सुडौल बनाने के लिए जांच के बाद बोटाक्स व फैट(चर्बी) का इंजेंक्शन दिए जाते हैं। इसके अलावा प्लाज्मा रिच प्लेट्लेट्स(पीआरपी) थेरेपी का उपयोग एंटीएजिंग के रूप में किया जाता है। इसमें खून से प्लाज्मा व प्लेटलेट्स निकाल कर अंग विशेष में इंजेक्ट करते हैं।
पीजीआई की डॉ. इंदु लता ने बताया कि महिलाओं को गर्भावस्था के शुरुआती 20 महीने में भ्रूण की जांच करानी चाहिए, ताकि गंभीर बीमारी का गर्भ में ही पता लगाया जा सके। गर्भ में ही तमाम तरह की बीमारियों का इलाज मुमकिन है। उन्होंने बताया कि गर्भ में ही कई तरह के ट्यूमर भ्रूण से निकाले जा सकते हैं। ऐसे में जन्म के बाद शिशु की सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती है।












