…तो इसलिए नहीं हो रहा Kgmu में किडनी प्रत्यारोपण

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लखनऊ। किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में किडनी प्रत्यारोपण, आईसीयू व आपरेशन थियेटर न हो पाने के कारण ठप चल रहा है। लगभग छह महीने से किडनी प्रत्यारोपण नहीं हो सका है। इस समस्या का निदान करने के लिए केजीएमयू प्रशासन ने दावा किया गया था। जब कि किडनी की गंभीर समस्या से जूझ रहे मरीज प्रत्यारोपण कराने के लिए वेंटिग में है। केजीएमयू के जिम्मेदार अधिकारियों ने संस्थान को किडनी ट्रांसप्लांट हब बनाने का दावा किया जा रहा है।

केजीएमयू की नेफ्रोलॉजी विभाग को ही शुरू करने में तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। विभाग शुरू होने के बाद ओपीडी सप्ताह में चार दिन चलने लगी। ओपीडी में लगभग 125-150 तक किडनी के मरीज पहुंचते हैं, जिनमें जांच पड़ताल के बाद 70 से 80 मरीजों को डायलिसिस की आवश्यकता पड़ती है। इन्हीं मरीजों में काफी मरीज ऐसे होते है, जिनको किडनी प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है। विभाग के तमाम कोशिश के बाद भी पिछले वर्ष दिसंबर माह में किडनी प्रत्यारोपण प्रोग्राम शुरू हो पाया था।

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इस वर्ष अप्रैल में आखिरी किडनी प्रत्यारोपण होने के बाद पूरी तरह से ठप हैं। इस दौरान भी मात्र पांच ही प्रत्यारोपण हो पाये थे। आखिरी प्रत्यारोपण के बाद जिस विभाग की ओटी में प्रत्यारोपण होता था और जहां आईसीयू मे मरीजों को रखा जाता था। उसने देने से इनकार कर दिया गया।
जुलाई महीने तक तत्कालीन कुलपति ने ओटी व आईसीयू को दिलाने का आश्वासन दिया था,परन्तु अभी तक कुछ नहीं हो पाया है, जिस के कारण प्रत्यारोपण के लिए मरीज वेंटिग में चल रहे है।

किडनी प्रत्यारोपण के लिए मरीजों में मात्र एक प्रतिशत के पास ही प्रत्यारोपण के लिए डोनर होता है. जिसके कारण से बड़ी दिक्कत आती है। कई बार डोनर की किडनी मैच नहीं करती, क्योंकि परिवार में किसी को डायबिटीज, कैंसर आदि बीमारियां होती हैं या फिर ब्लड ग्रुप मैच नहीं करता, जिसकी वजह से दिक्कत और बढ़ जाती है।

केजीएमयू में प्रत्यारोपण का खर्च करीब 3 से 4 लाख रुपये आता है। जबकि निजी अस्पतालों में प्रत्यारोपण का खर्च दस लाख से ऊपर तक चला जाता है, इसीलिए मरीज भी सरकारी संस्थानों का रुख करते है. इसके अलावा, संस्थान में आयुष्मान और असाध्य रोग योजना के तहत ट्रांसप्लांट पूरी तरह फ्री में होता है, जिससे गरीब मरीजों को बड़ी राहत मिलती है।

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