किसी भी बीमारी में इलाज से फायदा ना हो तो तत्काल ले एक्सपर्ट की सलाह

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शरीर में बीमारीयां अपना घर बना लें और इलाज के बाद भी फायदा न हो रहा हो साथ ही बीमारी का कारण पता न चल पा रहा हो। कुल मिलाकर जब शरीर अपना ही दुश्मन बन जाये तो ऐसे मरीज को बिना देरी किये विशेषज्ञ चिकित्सकों की सलाह लेनी चाहिए,क्योंकि जैसे – जैसे समय बीतता जायेगा,मरीज का जीवन बचाने में उतनी ज्यादा समस्या होगी। यह कहना है पीजीआई के इम्यूनोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष डा.आर.एन.मिश्रा का। वह गुरुवार को इंडियन रयूमेटोलॉजी एसोसिएशन द्वारा आयोजित चार दिवसीय वार्षिक अधिवेशन के दौरान ल्यूपस नामक बीमारी के प्रति लोगों में जागरुकता लाने के लिए पत्रकारों को सम्बोधित कर रहे थे।

उन्होंने बताया कि ल्यूपस ऐसी बीमारी है, जिसमें अपना ही शरीर व्यक्ति का दुश्मन हो जाता है। इस बीमारी में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो जाती है। इस बीमारी में सर के बाल से लेकर पांव के नाखून तक किसी भी अंग में डिफेक्ट आ सकता है,लीवर,किडनी,फेफड़ तथा हड्डीयां कु छ भी चपेट में आ सकते हैं। उन्होंने बताया कि कई मामलों में देखा जाता है कि किडनी तथा लीवर की बीमारी में सालों इलाज कराने के बाद भी नहीं पता चल पाता। यदि इन मरीजों को रयूमैटोलाजिस्ट के पास ले जाया जाये,तो बीमारी तथा उसके कारणों का सटीक पता लगाया जा सकता है। यदि किसी बीमारी के कारणों की जानकारी नहीं हो पा रही है,तो तीन साल के भीतर मरीज को रयूमैटोलाजिस्ट के पास पहुंच जाना चाहिए।

इस समय के भीतर मरीज के बीमारी को आगे बढऩे से रोका जा सकता है। इस अवसर पर आटोइम्यून बीमारीयों के विशेषज्ञ डा.रामराज सिंह ने बताया कि ल्यूपस बीमारी की चपेट में महिलायें ज्यादा आती हैं। इस बीमारी में १० हजार की आबादी में एक व्यक्ति इस बीमारी से पीडि़त होता है। यह अधिवेशन ३० नवम्बर से ३ दिसम्बर तक चलेगा। जिसमें आटो इम्यून से जुड़ी बीमारियों के इलाज व बीमारी को पता करने की नयी तकनीकों एवं इस विशेषज्ञता में संबंधित शोधों पर विस्तृत चर्चा होगी। आटोइम्यून बीमारी में ३० से अधिक बीमारियां आती हैं जो शरीर के अलग-अलग अंगों को प्रभावित कर उसकी कार्यप्रणाली को बाधित करती हैं। आटोइम्यून बीमारी से ३ से ४ फ ीसदी लोग प्रभावित होते हैं जिसमें रयूमेटाइड अर्थराइटिस, वैस्कुलाइटिस, सिस्टमिक ल्यूपस अर्थमेटोसस तथा पालीमायोसाइटिस सहित तमाम बीमारियों से लोग प्रभावित होते हैं।

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