लखनऊ – किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के कलाम सेंटर में शनिवार को सीएफएआर विभाग द्वारा वार्षिक थैलेसेमिया अपडेट 2018 का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन सीएफएआर विभाग ;साइटोगेनेटिक्स यूनिट, बाल चिकित्सा विभाग, पैथोलॉजी विभाग, ओबस्टेट्रिक्स और स्त्री रोग विभाग, थैलेसेमिक्स इंडिया सोसाइटी, लखनऊ के सहयोग से किया गया। इसमें थैलेसेमिया से बचाव के अपडेट व इलाज की जानकारी दी गयी।
इस कार्यक्रम की अध्यक्षता एवं उद्घाटन इरा मेडिकल कॉलेज के कुलपति प्रो. अब्बास अली महदी एवं प्रो. अमिता जैन ने किया। इस अवसर पर मानव आनुवंशिकी संस्थान, अहमदाबाद, गुजरात के निदेशक डॉ. जयेश शेथ, पीजीआई, चंडीगढ़ के पीडियाट्रिक्स विभाग के प्रो. इनुशा पनग्राही, केजीएमयू के हेमेटोलॉजी के विभागाध्यक्ष प्रो. ए के त्रिपाठी सहित अन्य विशेषज्ञों ने अपने थैलेसीमिया रोग के बचाव व उपचार पर जानकारी साझा की। इस कार्यक्रम का आयोजन सीएफएआर विभाग ,साइटोगेनेटिक्स यूनिट की सहायक प्रो. डॉ. नीतू निगम ने किया।
इस अवसर पर इस बीमारी से पीड़ित मरीज और उसके ने विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। इस दौरान लखनऊ निवासी एक पीड़ित सोनी यादव ने इस बीमारी के बारे में अपने अनुभव सांझा करते हुए बताया कि उन्हें ढाई साल की उम्र में इस बीमारी के होने का पता चला। हालांकि उनके परिवार ने कभी इस बीमारी को उनकी पढाई लिखाई में आड़े नहीं आने दिया और फिलहाल वह फॉर्मासिस्ट की पढ़ाई कर रहीं हैं।
जाने क्या है थैलेसीमिया और इससे बचने के उपाय
थैलेसीमिया खून की एक गंभीर बीमारी हैं इस बीमारी से ग्रस्त बच्चे को 3 महीने से 1 साल की उम्र के बीच खून की कमी होने लगती है। थैलेसीमिया के कारण होने वाली खून की कमी को रक्त चढ़ती मात्रा को कम करने के लिए डेस्फराल या केल्फर या डेफेरीसिराक्स नामक दवाई शुरू करनी पड़ती है। थैलेसीमिया मेजर एक प्रकार की अनुवांशिक बीमारी है।
बीटा- थैलेसीमिया बीमारी मे हीमोग्लोबिन बनाने वाली बीटा-ग्लोबिन जीन की खराबी होती है, जिससे हीमोग्लोबिन सही मात्रा मे ं नहीं बन पाता है। यह बीमारी तभी होती है जब बच्चें के जीन की दोनो प्रतियों (माता और पिता से मिली एक-एक प्रति) में खराबी हो। यह तब ही संभव है जब माता-पिता मे ं एक बीटा-ग्लोबिन जीन खराब हो। ऐसा व्यक्ति जिसमें जीन की एक प्रति खराब हो उसे कैरियर कहते है।
प्रसवपूर्व गर्भ परीक्षण। गर्भवती स्त्री के गर्भ में बच्चे की जांच 10-12 हफ्ते पर सीवीएस या 14-16 हफ्ते में गर्भ के पानी की जांच से कर सकते है। यह पता लगाया जाता है कि वह बच्चा थैलेसीमिया मेजर से ग्रसित है या नहीं। यदि निदान में पता चलता है कि बच्चा ग्रसित है तो गर्भपात का उपाय माता-पिता को बताया जा सकता है। इससे परिवार में थैलेसीमिया मेजर से ग्रस्त बच्चे के जन्म की पीड़ा से बचाव हो सकता है।
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