बच्चों को तीन वर्ष तक मोबाइल से रखें दूर
लखनऊ। नयी तकनीक व सोशल मीडिया के जमाने में लोग तेजी से एमप्टी इनबाक्स सिंड्रोम की चपेट में आ रहे है। हर वक्त मोबाइल चेक करना, जैसे ही कोई मैसेज या मेल आयी, तो उसको तुरंत देखने की कवायद शुरू कर देना। अगर नहीं देख पाये तो तनाव महसूस करते है। अगर यह दिन चर्या में शामिल है तो सब कुछ बेहतर नहीं है। यह जानकारी शुक्रवार को केजीएमयू के मानसिक विभाग के स्थापना दिवस के अवसर पर मुख्य अतिथि व वक्ता डॉ. मनोज कुमार शर्मा ने प्रौद्योगिकी की लत और इसके मनोसामाजिक सहसंबंध विषय पर बोलते हुए दी।
डॉ. शर्मा ने कहा कि लोगों में तकनीकी एडिक्शन बड़ी समस्या बढ़ती ही जा रही है। इसके कारण जिसकी दिनचर्या में समस्या, हेल्थ , आपसी सम्बंध में प्रभाव , बच्चों का कैरियर व स्किल आदि खराब हो रहे है, जिसकी वजह से कई डिस्आर्डर अब लोगों में बेहद कॉमन से दिखने लगे है। इसके अलावा फेसबुक डिप्रेशन के मामले भी बढ़ रहे है, खास कर जो सोशल मीडिया ज्यादा प्रयोग करते है। वह इस चक्कर में दूसरों की लाइफ के साथ अपनी लाइफ की तुलना करने लगते है। उनको लगता है कि उनकी जिंदगी में सबकुछ खराब चल रहा है, जिससे वो साइकोलॉजिकली लो फील करने लगते है।
उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी के प्रयोग में प्रिवेंशन बेहद जरूरी है। बच्चों में शुरुआत के तीन वर्ष स्क्रीन का यूजर नहीं होना चाहिए। अभिभावकों की देख रेख में इसकी टाइमिंग ज्यादा कर सकते है। इसके साथ ही फैमिली में डिवाइस को लेकर नियम बनाना चाहिए। रात में कम से कम व सुबह उठने के एक-दो घंटे तक स्क्रीन नहीं देखना चाहिए। तीसरा खाने के समय स्क्रीन का प्रयोग बिलकुल न करना चाहिए। अगर देखा जाए तो पांच फीसदी लोगों में यह समस्या बेहद गंभीर स्तर पर देखने को मिलती है। आवश्यकता होने पर इलाज किया जाता है। कार्यक्रम के दौरान प्रो-वीसी डॉ. विनीत शर्मा, डीन डॉ. उमा सिंह, विभागाध्यक्ष डॉ. विवेक अग्रवाल समेत अन्य वरिष्ठ डाक्टर मौजूद थे।












