किडनी में यह डायलिसिस मरीज के लिए कारगर

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लखनऊ। गैर-संचारी रोग (एनसीडी) आज एक बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। एनसीडी में हो रही बढ़ोतरी की दर सबसे ज्यादा है। ऐसा ही एक एनसीडी है क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी), जिसे क्रॉनिक रीनल फेलियर, क्रॉनिक रीनल डिजीज या क्रॉनिक किडनी फेलियर भी कहा जाता है। यह लोगों की जानकारी से कहीं अधिक व्यापक है और अच्छी तरह बढ़ने तक इस पर ध्यान नहीं दिया जाता है या इसका पता नहीं चलता है। द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार सीकेडी रोगियों का अनुपात कुल आबादी में 8-17 प्रतिशत हो सकता है। एंड स्टेज किडनी फेलियर (ईएसकेएफ) किडनी फेलियर की सबसे आखिरी अवस्था है। प्रति वर्ष एंड स्टेज रीनल डिजीज (ईएसआरडी) के करीब 2.2 लाख नये रोगी जुड़ते हैं, इसलिये हर साल 3.4 करोड़ डायलिसिस की अतिरिक्त मांग बढ़ जाती है।

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क्रॉनिक किडनी डिजीज पर पीजीआई के नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. अमित गुप्ता कहा कि सीकेडी सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर समस्या है। जीवनशैली की समस्याओं के कारण क्रॉनिक किडनी डिजीज के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इस कारण डायलिसिस की मांग बढ़ना तय है। उन्होंने बताया कि पेरिटोनियल डायलिसिस में रख-रखाव और कर्मचारियों की लागत नहीं लगती है। इस उपचार से डायलिसिस सेवाओं तक रोगियों की पहुँच भी समान रूप से बेहतर हो सकती है।
डा. गुप्ता ने बताया कि पेरिटोनियल डायलिसिस (पीडी) मानक डायलिसिस थेरैपी का एक रूप है, जिसमें एक व्यक्ति के उदर के पेरिटोनियम का उपयोग ऐसी झिल्ली के तौर पर किया जाता है, जिसके माध्यम से तरल और घुलनशील पदार्थों को रक्त से बदला जाता है।

मूलरूप से इमें डायलीसैट नामक एक स्वच्छता तरल की सहायता से शरीर के अपशिष्ट बाहर निकाले जाते हैं, जिसे एक कैथेटर के जरिये नाभि की लाइनिंग में डाला जाता है। इस ट्यूब के माध्यम से तरल को अशुद्धियों के साथ उदर के भीतर और बाहर धोया जाता है। इस प्रकार, डायलिसिस के इस रूप में रक्त शरीर के बाहर पंप नहीं किया जाता है।
इंडियन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी के सचिव तथा पीजीआई के ही नेफ्रोलॉजी डॉ. नारायण प्रसाद ने बताया कि सीकेडी के लिये सुविधाजनक तरीकों के साथ पेरिटोनियल डायलिसिस इलाज एक महत्वपूर्ण विधि है, जो ह्मदय के लिये अनुकूल और घरेलू है।

पीडी एक सुविधाजनक और घरेलू विधि है, जिसे सही प्रशिक्षण के बाद रोगी या उसके परिवार का कोई भी सदस्य कर सकता है। इस तरह के डायलिसिस का एक अन्य लाभ यह है कि इसमें हार्ट पर दबाव नहीं पड़ता है और इसकी जटिलताएं न्यूनतम होती हैं। केवल एक बात का ध्यान रखना चाहिये कि पर्याप्त स्वच्छता बनाये रखें। अच्छी तरह हाथ धोने से संक्रमण का जोखिम यथासंभव कम होता है।

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