केजीएमयू का लॉरी कार्डिंयोलॉजी हिसपेसमेकर लगाने वाला उत्तर भारत का पहला संस्थान

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लखनऊ। उत्तर भारत में हिस बंडल पेसमेकर प्रत्यारोपण लगाने वाला किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के लॉरी कार्डियोलॉजी विभाग पहला चिकित्सा संस्थान बन गया है। यहां के विशेषज्ञ डाक्टरों ने डा. शरदचंद्रा के नेतृत्व में पेसमेकर प्रत्यारोपण के क्षेत्र में अब तक की सबसे नवीनतम तकनीक हिस बंडल पेसमेकर लगाने में सफलता प्राप्त की है। इस तकनीक से लॉरी कार्डियोलॉजी में तीन हिस बंडल पेसमेकर मरीजों में सफलतापूर्वक लगाये चुके है। विशेषज्ञों का दावा है कि इस नवीनतम तकनीक से पेसमेकर सत्तर हजार रुपये तक के खर्च में लगा दिया जाता है। जब कि पहले पेसमेकर लगाने में दो से तीन लाख रुपये तक का खर्च आता था। इस नयी तकनीक से हार्ट फेल्योर का खतरा भी कम होता है।

डा. शरद चंद्रा ने बताया कि कुछ दिनों पहले हरदोई निवासी (60) बिटौली ूलॉरी कार्डियोलॉजी की पहुंची थी। उसे सांस फूलने की समस्या तथा अक्सर अचानक बेहोश होने की दिक्कत भी बनी थी। यहां जांच में पाया गया था कि हार्ट की पंम्पिग कमजोर होने से शरीर में ब्लड की आपूर्ति ठीक से नहीं हो पा रही थी। डा. शरद ने बताया कि उन्होंने डॉ. गौरव चौधरी तथा डा. प्रवेश से साथ विचार- विमर्श करके के पास लाए और उन्होंने मरीज को देखने के बाद आधुनिक तकनीक हिज बंडल से पेसमेकर लगाने का निर्णय लिया। इस तकनीक में हार्ट की पंम्पिग कराने के लिए पेसमेकर से इलेक्ट्रिक तरंगे भेजने के लिए अभी तक तीन विभिन्न स्थानों पर लीड लगाने की बजाय एक लीड को हार्ट के हिस बंडल स्थान पर जोड़ दिया। इससे विधुत तरंग प्राकृतिक रूप से संचालित होने लगी आैर हार्ट पम्प करने लगा।

पूर्व में मांसपेशी में फिक्स करने की बजाय हार्ट के लिए विधुत बनाने वाले हिज बंडल में जोड़ा गया था। यहां पर एस ए नोड की मदद से विधुत तरंग बनने लगती है। उन्होंने बताया कि अभी तक देश में दो चिकित्सा संस्थान में इस तकनीक से पेसमेकर का प्रत्यारोपण किया गया है। अब तक दस से 12 मरीजों का इलाज ही इस तकनीक से किया जा चुका है। उन्होंने बताया कि इस पहले सीआरटी पेसमेकर प्रत्यारोपण में तीन लीड हार्ट के विभिन्न हिस्सों में लगाई जाती थीं। ऐसे में अक्सर एट्रिल वेंट्रिकल हिस्से में लीड लगाने से विधुत तरंगों लगने मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर हो जाती थीं आैर 30-40 प्रतिशत मरीजों में हार्ट फेल्योर हो जाता था।

डॉ. शरद चन्द्रा ने बताया पहले पेसमेकर लगाने पर अक्सर मरीज की धड़कन भी अनियमित हो जाती है। मरीज मानसिक रूप से परेशान होने लगता है। इसे पेसमेकर सिंड्रोम कहते हैं। मरीज को घबराहट होती है। गर्दन में दर्द होने लगता है। सांस फूलने लगती है। पैरों में सूजन आ जाती थी, पर अब नयी तकनीक से ऐसा कुछ नहीं होता है।

ऐसे  बना उत्तर भारत का पहला चिकित्सा संस्थान

डा. गौरव चौधरी ने बताया कि लॉरी कॉर्डियोलॉजी में नई तकनीक से पेसमेकर का प्रत्यारोपण सोमवार को किये गये थे। इस प्रत्यारोपण की तकनीक में मदद के लिए हंगरी के एक चिकित्सा विश्वविद्यालय के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. गैलर आये थे। इससे पहले वह आैर डा. शरद चंद्रा, डा. प्रवेश प्रशिक्षण वहां से ले आ चुके है। उनके निर्देशन में नयी तीन नयी तकनीक से हिस बंडल पेसमेकर लगाया गया। इस तकनीक से पेसमेकर लगाने के बाद मरीज को 24 घंटे बाद ही डिस्चार्ज कर दिया जाता है। डा. चौधरी ने बताया कि 60 से 70 साल की उम्र पार करने वाले लोगों में दिल की धड़कन कमजोर होने लगती है। इसका अहम कारण दिल में मौजूद इलेक्ट्रिक नोड की कोशिकाओं का बेकार होने लगती है। इलेक्ट्रिक नोड ठीक से काम नहीं करता है। ऐसे मरीजों में पेसमेकर लगाने की जरूरत पड़ती है। उन्होंने बताया कि
अभी तक पेसमेकर प्रत्यारोपित करने में डेढ़ से दो घंटे लगते थे। पर, नई तकनीक से प्रत्यारोपण आधे घंटे में हो जाता है। का समय लग रहा है। लॉरी कॉडियोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. वीएस नारायण ने बताया कि साल में 850 मरीजों में पेसमेकर लगाया जा रहा है। इतने पेसमेकर लगाने के बाद केजीएमयू चुनिंदा संस्थानों में आ जाता है।

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