लखनऊ – कबूतर व अन्य पालतू जानवर को घर में रखना खतरनाक हो सकता है। कबूतर समय अन्य जानवर सांस के गंभीर रोग आईएलडी का कारण बन सकते हैं। आईएलडी होने पर व्यक्ति को सांस लेने में दिक्कत के साथ जोड़ों में दर्द तक हो सकता है। चिकित्सकों ने आईएलडी के लक्षण व उसका इलाज तो खोज लिया है लेकिन अभी उसके कारण जानना शेष है। यह जानकारी चेस्ट रोग विशेषज्ञ प्रो. दिग बर बेहरा ने दी।
पीजीआई चण्डीगढ़ से आए प्रो. बेहरा शनिवार को होटल क्लार्क अवध में आईएलडी (इंटेरेसटीशियल लंग डिजीज) पर आयोजित नेशनल सीएमई में बोल रहे थे। डॉ. बेहरा ने बताया कि आईएलडी 140 बीमारियों का समूह है, इस बीमारी की पहचान आसानी से हो जाती है। कुछ 20 प्रतिशत बीमारियों का इलाज भी संभव है, मगर यह बीमारी न हो, उन कारणों की जानकारी नहीं है क्योंकि इस बीमारी के होने के सभी कारणों की पुष्टि नहीं हो सकी है। हालांकि जो जानकारियां मिली है उनमें कबूतर के पं ा, जानवरों के बालों पर पाए जाने वाले रूसी ड्रग्स, फफूंद एवं वातावरणीय प्रदूषण प्रमुख कारण पाए गए। उन्होंने बताया कि भारत में यह बीमारी 1972 में डायग्नोस हुई थी, मगर उसके बाद भी गुणवत्ता युक्त जांच मशीनों के अभाव में मरीजों की अधिक पुष्टि नहीं होती थी।
वर्तमान में आधुनिक मशीनें उपलब्ध होने के साथ ही लक्षणों की पुष्टि हो चुकी है, जिसकी वजह से आसानी से पहचान किया जा सकता है। इसकी पहचान और बीमारी की गंभीरता को बढ़ाने के लिए डॉक्टरों में जागरूकता बढ़ानी है। क्योंकि जागरूकता के अभाव में आज भी 67 प्रतिशत आईएलडी मरीजो को टीबी की दवा दी जा रही हैै। उन्होंने बताया कि यह बीमारी भारत ही नहीं पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रही है। भारत में बीते दो साल की ओपीडी में 800 मरीज ाुद पंजीकृत किये हैं, जबकि तमाम संबन्धित अस्पताल पहुंच ही नहीं पाते हैं। इस अवसर पर केजीएमयू के कुलपति प्रो. एमएलबी भटट् की अध्यक्षता में मु य अतिथि डॉ. डी. बेहरा ने डॉ. सूर्यकांत की पुस्तक हैण्ड बुक ऑफ आईएलडी का विमोचन किया। इस अवसर पर एरा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अब्बास अली, केजीएमयू के अन्य चिकित्सक मौजूद थे।
दवाओं के गठजोड़ से भी होता है आईएलडी
आयोजन सचिव और एरा मेडिकल कालेज के पल्मोनरी मेडिसिनि विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. राजेन्द्र प्रसाद ने बताया कि इस बीमारी ने अपनी दस्तक तेज कर दी है, अमेरिका से आने वाली इस बीमारी में पहले एक ला ा आबादी में 30 लोग बीमार होते थे हलांकि अब यह सं या कम हो गई है। मगर, आबादी बढ़ने की वजह से रोगियों की सं या तेजी से बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि यह रोग अन्य बीमारियों की दवाओं के साइड इफेक्ट के रूप में भी हो जाती है। इसलिए अगर आपकों कुछ जीने चढ़ने पर सांस फूलने लगती है और सू ाी ाांसी आती है तो तुरन्त एलर्ट हो जाईये और विशेषज्ञ से इलाज ले अन्यथा एक समय स्थिति बहुत ाराब हो जाती है।
अब PayTM के जरिए भी द एम्पल न्यूज़ की मदद कर सकते हैं. मोबाइल नंबर 9140014727 पर पेटीएम करें.
द एम्पल न्यूज़ डॉट कॉम को छोटी-सी सहयोग राशि देकर इसके संचालन में मदद करें: Rs 200 > Rs 500 > Rs 1000 > Rs 2000 > Rs 5000 > Rs 10000.












