लखनऊ। कार्डियोवस्कुलर एण्ड थैरोसिक सर्जरी के प्रो. एसके अग्रवाल व प्रो. शातनु पाण्डेय ने बताया कि हार्ट फेल्योर होने पर हार्ट के सपोर्ट के वेंट्रीकल असिस्टेड डिवाइस (बीएडी) सीने के नीचे लगाकर दिल से जोड़ा जाता है, इससे हार्ट की पम्पिंग ठीक रहती है। बीएडी के जरिए भी पांच से दस साल सामान्य जिदंगी मिल सकती है लेकिन इस डिवाइस की कीमत 75 लाख रुपये है, जिसके कारण सामान्य व्यक्ति इसे नहीं लगवा पाता है। सरकार वैसे अन्य बीमारियों के इलाज के लिए पैसा देती है, वैसी ही बीएडी के लिए भी पैसा देना चाहिए।
इसके लिए पोस्ट सर्जरी फलोअप की जरूरत है –
यह जानकारी संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के कार्डियोवस्कुलर एण्ड थैरोसिक सर्जरी (सीबीटीएस) के स्थापना दिवस के दो दिवसीय हार्ट ट्रांसप्लांट पर कार्यशाला में दी गयी। कार्यशाला में प्रो. गौरंग मजूमदार ने किडनी, लिवर की तरह हार्ट के ट्रांसप्लांट के बाद रिजेक्शन की आशंका अधिक आशंका रहती है, इसके लिए पोस्ट सर्जरी फलोअप की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हम लोग हार्ट की बायोप्सी कर हार्ट की कोशिकाओं में पैथोलाजिस्ट देखते हैं कि कोशिका में लिम्फोसाइट, ल्यूकोसाइड सेल की संख्या बढ़ने का मतलब है कि शरीर प्रत्यारोपण हार्ट को स्वीकार नहीं कर रहा है। ऐसे में इम्यूनोसप्रेसिन दवाओं के जरिए रिजेक्शन कम करने की कोशिश करते हैं। उन्होंने कहा कि हार्ट रिजेक्शन रेट सात से आठ फीसदी तक होता है।
सीबीटीएस के अध्यक्ष प्रो. निर्मल गुप्ता ने कहा कि अंग प्रत्यारोपण में कई तरह की दिक्कतें आती हैं। पहली दिक्कत तो अंगों के मिलान में आती है। यदि आपके किसी निकट रिश्तेदार का कोई अंग आपसे मैच नहीं कर रहा तो उसका प्रत्यारोपण नहीं हो सकता। इसके अलावा ब्रोन डेड मरीजों के अंग मिलना भी काफी मुश्किलों भरा काम है।