गजब : गया था पैर कटवाने, उसी पैर से चलने लगा

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लखनऊ। वह युवक हताश होकर पैर कटवाने के लिए बलरामपुर अस्पताल पहुंचा था, पर यहां आर्थोपैडिक विशेषज्ञ सर्जन डा. जीपी गुप्ता ने उससे पैर काटने के बजाय उसी के सहारे चलाने का वादा किया तो उसे यकीन ही नहीं हुआ। बलरामपुर अस्पताल के निदेशक डा. राजीव लोचन ने उसकी महंगी दवा दिलाने में मदद की आैर डा. गुप्ता ने जटिल सर्जरी। सर्जरी के बाद अर्पित ने पहली बार अपने कटने वाले पैर को जमी पर रखा तो उसकी आंखों आंसू बहने लगे आैर उसने कहा जिंदगी को विकंलाग होने से बचा लिया, वाकई डाक्टर को भगवान यूं ही नहीं कहा गया है।

हरदोई निवासी अर्पित 25 वर्षीय पिछले साल जून में एक्सीडंेट में बुरी तरह से घायल हो गया था। उसके कम्पाउंड फ्रेक्चर में घुटने अौर एड़ी के बीच की हड्डी टूट गयी थी। किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के ट्रामा सेंटर की आथोपैडिक यूनिट में किया जा रहा है। उसके परिजनों का आरोप है कि कई बार जांच व आपरेशन के बाद भी पैर का घाव ठीक नहीं हो पा रहा था। पिछले दस माह से हर पन्द्रह दिन पर वह केजीएमयू जांच कराने के लिए आता था, जहां डॉक्टर डे्रसिंग कर देते थे लेकिन मवाद का बहना रोक नहीं पा रहे थे। उसके पैरों के घाव के जहां चलना-फिरना मुश्किल था । वहीं एक लाख रूपये खर्च के बाद वह आैर खर्चा करने में सक्षम नहीं था।

उसे पैर अंदर से सड़ने के कारण कटवाने का परामर्श दिया जा रहा था। इसस बेहाल अर्पित ने अपने को केजीएमयू में नहीं बलरामपुर अस्पताल में कटवाने पहुंचा। यहां पर बलरामपुर अस्पताल में अार्थोस्कोप विशेषज्ञ डॉ.जीपी गुप्ता ने कल्चर टेस्ट कराया। जिसमें आश्चर्य था कि 25 प्रकार के बैक्टरिया पर डॉ. एक एंटीबायटिक दवा ही असरकारक पायी। डा. गुप्ता ने जांच के बाद बताया कि मरीज के घुटने के नीचे गहरा घाव बना हुआ था, उसके पैर की हड्डी भी टूटी थी, इस कारण लगातार मवाद बह रहा था। उसे काफी समझाने के बाद वह पैर न काटने से पहले सर्जरी कटवाने के लिए माना। उधर मरीज की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उसका मुफ्त इलाज करने का निर्णय लिया।

उनके इस काम में अस्पताल के निदेशक डा. राजीव लोचन से मदद से लगभग 17 हजार रुपये की दवाएं व अन्य संसाधन को मुहैया कराया गया। ग्यारह मई को उसकी सर्जरी की गयी आैर टूटी हड्डी को विशेष तकनीक से जोड़ा गया आैर वहीं मवाद का रिसना भी बंद हो गया। डा गुप्ता ने बताया कि मरीज पूरी तरह से स्वस्थ है। अभी वाकर के सहारे चलाया जा रहा है। दो- तीन महीने में बिना वाकर के सहारे चलने लगेगा।

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